महिला साहित्यकार और उसके जीवन के संघर्ष
*शीर्षक: स्याही का ऋण*
*1. पहली लकीर*
पिपरा की गली नं-3 में, एक नीले दरवाज़े के पीछे, 8x10 का कमरा था। उसी कमरे की दीवार पर कील से टँगा था एक टूटा आईना, और आईने के नीचे रखी थी पुरानी गोदरेज की अलमारी। उसी अलमारी के सबसे नीचे वाले खाने में सावित्री अपनी डायरियाँ छुपाती थी।
सावित्री मास्टरजी की बेटी थी। मास्टरजी हिंदी पढ़ाते थे, पर घर में कहते थे, “लड़की की जात को ज़्यादा किताब सूँघना ठीक नहीं। आँखें खराब होती हैं, और सपने भी।” 1998 में जब सावित्री ने पहली कविता लिखी—"चूल्हे का धुआँ"—तो माँ ने वह कागज़ उसी चूल्हे में झोंक दिया। कहा, “धुएँ पर क्या लिखना, रोटी बेल।”
पर स्याही का नशा रोटी से ज़्यादा भूखा था।
*2. ब्याह और बंधन*
22 की उम्र में ब्याह हुआ। लड़का कानपुर में क्लर्क था। नाम था रमाकांत। सुहागरात को रमाकांत ने कहा, “देखो, नौकरी छोटी है, पर इज़्ज़त बड़ी है। घर की बात बाहर न जाए। और हाँ, लिखना-विखना का शौक है तो भजन लिख लिया करो। छपने-छपाने के चक्कर में मत पड़ना।”
सावित्री ने हाँ में सिर हिला दिया। पर रात के तीसरे पहर, जब रमाकांत खर्राटे लेता, वह रसोई के बल्ब के नीचे बैठकर कॉपी में लिखती। कागज़ नहीं था तो अख़बार के हाशिये, कैलेंडर की पिछली तारीखें, बच्चों की फटी कॉपियाँ—सब स्याही पीती गईं।
2005 में बेटा हुआ, 2008 में बेटी। अब समय और भी कम था। दूध उफनता, कविता उबलती। तवा जलता, पंक्ति जलती। पर वह लिखती रही।
*3. पहला तिरस्कार*
2012 में मोहल्ले के एक कवि-सम्मेलन में वह चुपके से चली गई। साड़ी का पल्लू दाँतों में दबाए, सबसे पीछे बैठी। जब नाम पूछा गया तो “सविता” बता दिया। मंच पर उसने पढ़ा:
“मैं बेलन नहीं, कलम हूँ माँ
मुझे सीधा मत बेलो
मैं टेढ़ी लिखती हूँ सच…”
ठहाका लगा। एक बुज़ुर्ग बोले, “माताजी, कविता में बेलन-चिमटा लाओगी तो रसोई बन जाएगी, साहित्य नहीं।”
घर आई तो रमाकांत को किसी ने बता दिया था। तीन दिन चूल्हा ठंडा रहा। चौथे दिन रमाकांत ने उसकी सारी डायरियाँ कबाड़ी को बेच दीं। 12 किलो रद्दी के 90 रुपये मिले। उन्हीं रुपयों से रमाकांत ने नई टॉर्च खरीदी। कहा, “अब रात में लिखोगी नहीं, तो रोशनी किस काम की।”
*4. दूसरी शुरुआत*
पर स्याही कब मरती है। सावित्री ने लिखना नहीं छोड़ा, छुपाना सीख लिया। मोबाइल आया तो नोट्स में लिखने लगी। पासवर्ड रखा: “बेलन123”। 2016 में फेसबुक पर “अनामिका” नाम से पेज बनाया। पहली पोस्ट पर 3 लाइक आए। दो अपने ही फेक अकाउंट से किए थे।
एक दिन बेटी ने पूछा, “मम्मी, अनामिका कौन है?” सावित्री हँसी, “तेरी मौसी।”
बेटी बड़ी हो रही थी। एक दिन उसने माँ का फोन लिया और पूरी वाल पढ़ डाली। रात को रोटी बेलते-बेलते बोली, “मम्मी, तुम तो बहुत अच्छा लिखती हो। पापा को क्यों नहीं दिखाती?”
सावित्री ने बेटी का मुँह भींच दिया, “चुप। दीवारों के भी कान होते हैं।”
*5. शहर और शर्त*
2019 में रमाकांत का तबादला लखनऊ हो गया। बड़ा शहर, छोटा मकान, पर एक खिड़की मिली। खिड़की के बाहर गुलमोहर था। सावित्री ने पहली बार दिन में लिखा।
लखनऊ में एक संस्था “कलम की कली” महिलाओं की रचनाएँ छापती थी। सावित्री ने “अनामिका” के नाम से कहानी भेजी: “टॉर्च की रोशनी”। कहानी छप गई। पारिश्रमिक मिला: 500 रुपये।
उस रात उसने 500 की साड़ी नहीं खरीदी। एक सेकंड-हैंड कीपैड वाला लैपटॉप ले आई। रमाकांत ने पूछा तो कहा, “बच्चों की ऑनलाइन क्लास के लिए।”
*6. बँटवारा*
2021 में कोरोना आया। रमाकांत की नौकरी चली गई। घर में पैसा नहीं, तनाव बहुत। उसी दौर में “कलम की कली” ने सावित्री को 10 हज़ार का पुरस्कार दिया। मंच पर नाम पुकारा गया: “सावित्री देवी”।
रमाकांत भी साथ गया था। घर लौटकर पहली बार उसने पूछा, “तुम ही अनामिका हो?”
सावित्री डर गई। पर रमाकांत हँसा नहीं, रोया। बोला, “मैंने तेरी 12 किलो ज़िंदगी 90 में बेच दी थी। मुझे माफ कर दे।”
उस दिन पहली बार रसोई में रमाकांत ने सब्ज़ी काटी। सावित्री ने लिखी:
“पुरुष जब रोता है
तो स्त्री की कलम
थोड़ी और नुकीली हो जाती है
क्योंकि अब उसे
अकेले नहीं लड़ना”
*7. कीमत*
कहानी वायरल हुई। प्रकाशक आए। किताब का प्रस्ताव आया। शीर्षक उन्होंने दिया: “चूल्हे से कलम तक”। सावित्री ने बदल दिया: “स्याही का ऋण”।
अनुबंध की रात रमाकांत ने कहा, “एडवांस के 50 हज़ार आ रहे हैं। बेटे की फीस भर देंगे।”
सावित्री ने कलम रोक दी। पूछा, “और मेरी फीस?”
“कैसी फीस?”
“23 साल। हर रात के 2 घंटे। उसका हिसाब।”
कमरे में सन्नाटा था। बेटी ने धीरे से कहा, “पापा, मम्मी की फीस मत काटो। मम्मी ने हमें पालने के लिए लिखना नहीं छोड़ा, लिखने के लिए हमें पाला है।”
*8. विमोचन और विराम*
2023, लखनऊ विश्वविद्यालय। हॉल खचाखच भरा। मंच पर सावित्री। पहली पंक्ति में रमाकांत, बेटा, बेटी।
उद्घाटन करने आईं 84 साल की लेखिका, बोलीं, “मैंने 1960 में लिखा था कि एक दिन रसोइयों से उपन्यास निकलेंगे। आज वह दिन है।”
सावित्री ने माइक सँभाला। कहा, “मैं लेखिका बाद में हूँ, बाधा पहले थी। मुझे मिटाने की कोशिश में घर ने, समाज ने, खुद मैंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। पर स्याही का ऋण था मुझ पर। जो हर अक्षर के साथ बढ़ता गया।”
“आज यह किताब मेरी नहीं। यह उन सब औरतों की है जो मार्जिन में कविता लिखती हैं, क्योंकि पन्ने का बीच का हिस्सा अब भी रिज़र्व है।”
हॉल तालियों से गूँज उठा। पर सावित्री तालियों में नहीं, तीसरी पंक्ति में बैठी उस लड़की को देख रही थी, जो दुपट्टे में अपना चेहरा छुपाए डायरी में कुछ लिख रही थी।
*9. अंत नहीं, शुरुआत*
घर लौटकर सावित्री ने अलमारी खोली। सबसे नीचे वाला खाना अब खाली नहीं था। वहाँ नई डायरियाँ थीं। बेटी की। पहले पन्ने पर लिखा था: “माँ, अपना उपनाम मुझे दे दो। मैं ‘अनामिका’ से ‘सविता’ बनना चाहती हूँ।”
सावित्री ने बेटी को गले लगाया। बाहर गुलमोहर झर रहा था। लाल पंखुरियाँ खिड़की से आकर लैपटॉप पर बैठ गईं। सावित्री ने उन्हें हटाया नहीं।
क्योंकि अब वह जानती थी—संघर्ष स्याही को सुखाता नहीं, और गाढ़ा कर देता है। और गाढ़ी स्याही से ही समय के माथे पर लकीर खिंचती है।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी
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