"गीत - मधुर मिलन"
बोलो-बोलो कुछ तू बोलो,
मधुर-मिलन कहाँ पर होगा।
जीवन की मधुरिम बेला में,
विरह सेज कंटक बन चुभे।
यौवन की सुरभित धारा में,
प्रणय दीप जल-जल बुझे।।
बोलो-बोलो कुछ तू बोलो,
मधुर-मिलन कहाँ पर होगा।।
अब रहा नहीं जाता मुझसे,
जो सहा नहीं जाता हमसे।
धूप चली कहाँ निष्ठुर चकोरी,
बढ़ा भार साँसों की डोर।
देख प्रात ममता की लाली
लिए हाथ पूजा की थाली।
गिरि-गह्वर में भटक रहा हूँ,
यौवन उपवन की रूठी मालिन।
रोम-रोम में धुआँ उठ रहा,
विरह व्योम पीड़ा बन जलते।
जलता जीवन, मलते हाथ,
पल-पल युग सह प्राण सुलगें।।
आँख दीवानी मेरा कुछ तुमसे,
अंदर ही अंदर हो चूका है।
अहा! विवशता कितना जीवन
क्यों न पांव बेड़ी खुले हैं।
हाय छीन गया, जीवत मेरा
प्रणय पीर का छोर नहीं है,
तड़प-तड़प जीना भी क्या है,
जीवन में अब किरण नहीं है।
टूट रही आशा की किरणें
तिमिर बन गया जीवन मेरा।
देख भोर की मंगल किरणें,
लिखा भाग्य में कहीं सवेरा।
बोलो-बोलो कुछ तू बोलो,
मधुर-मिलन कहाँ पर होगा।।
- सुख मंगल सिंह
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