"मदैनिया की मिट्टी और 1977 तक की सियासी हवा - एक संस्मरण:"
1977 से पहले का मदैनिया, टांडा तहसील का वो इलाका था जहाँ राजनीति गाँव की चौपाल से शुरू होती थी और खेत की मेड़ पर खत्म। उस वक्त पार्टी का झंडा कम, व्यक्ति का कद ज्यादा बोलता था। लोग "जनसंघी" या "कांग्रेसी" इसलिए नहीं बने थे कि उन्हें दिल्ली की पॉलिसी पढ़नी थी, बल्कि इसलिए कि उनके गाँव के बड़े किस तरफ खड़े थे।
"चौपाल के स्तंभ"
बच्चा बाबा और राज बहादुर पांडे मदैनिया - दोनों जनसंघ के ध्वजवाहक। बच्चा बाबा का नाम ही काफी था। सादगी ऐसी कि धोती-कुर्ता और पैरों में खड़ाऊँ, पर बोल ऐसा कि सभा सन्न। राज बहादुर पांडे जी तर्क के धनी। वो बिना चिल्लाए भीड़ को समझा देते कि "स्वदेशी" का मतलब क्या होता है। मदैनिया की हर बैठक में उनकी मौजूदगी अनुशासन लेकर आती थी।
उधर गुलाब सिंह खमरिया कांग्रेस के मज़बूत स्तंभ। कांग्रेसी तो थे, पर दबंगई में ही नहीं, मिलनसारिता में भी वह मिलन सार थे। उनके यहाँ हर जात-बिरादरी की बैठक होती थी। उदय राज सिंह मुबारकपुर अंजन उनके "गोल" के थे। उदय राज सिंह मतलब - जमीन से जुड़ा आदमी, जो पंचायत में फैसला सुना दे तो दोनों पक्ष मान जाएँ।
"जनसंघ का कुनबा"
बजरंग सिंह कमरिया और शमशेर सिंह चांदीपुर - पक्के जनसंघी थे। बजरंग सिंह का "गोल" अलग ही था। तेज प्रताप सिंह सिकरौरा उन्हीं के साथ में रहते मिलते जुलते थे सिकरौरा से आवाज़ उठती तो आसपास के 5-6 गाँव सुनते। रामदेव सिंह बभनपुरा भी राज बहादुर पांडे जी के साथ मदैनिया से जुड़े। और किछौछा के वासुदेव साव - व्यापारी वर्ग से, पर जनसंघ की विचारधारा के पक्के। वो चंदा भी देते और कार्यकर्ता भी जुटाते थे। किछौछा में वासुदेव साव इंटर कॉलेज खुलवाएं जिसमें आज लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
"दबंगई बनाम बदमाशी"
आपने सही लिखा - "दबंग लोगों में: नहीं आज कल लोग बदमाश कहते हैं"। फर्क साफ था। मदन सिंह जैयती, राम मूरत डूबे बसखारी, जय राम सिंह अहिरौली रानी मऊ, सर मुख सिंह मुबारकपुर अंजन, बीपत तिवारी बालीपुर - ये वो नाम थे जिनका "डर" था पर "आतंक" नहीं।
दबंग का मतलब था - गाँव की इज्जत की रखवाली। किसी की बहू-बेटी पर आँच आई तो सबसे पहले यही लोग खड़े होते थे। पंचायत में फैसला कड़क होता था पर नीयत साफ। बदमाशी तब शुरू हुई जब इज्जत की जगह स्वार्थ ने ले ली। 1977 के बाद राजनीति में जो बदलाव आया, उसमें ये फर्क धुंधला पड़ गया।
"1977 का मोड़"
इमरजेंसी के बाद जब चुनाव हुआ, तो मदै निया की हवा भी बदल गई। जनसंघ के लोग जेपी आंदोलन की लहर में और मजबूत हुए। कांग्रेसी खेमे में भी उथल-पुथल। पर गाँव में आज भी लोग कहते हैं कि उस दौर में बहस होती थी, मारपीट नहीं। गुलाब सिंह खमरिया और राज बहादुर पांडे आमने-सामने भाषण देते थे, फिर शाम को एक ही हुक्के से दम लगाते थे। विचार अलग, रिश्ता अलग।
आज जब नए दौर की "बदमाशी" देखते हैं, तो पुराने लोग आह भरकर कहते हैं - "पहले दबंगई थी, अब बदमाशी है। पहले लोग गाँव बचाते थे, अब गाँव लूटते हैं।"
मदै निया की मिट्टी गवाह है कि राजनीति बिना लाठी के भी हो सकती है, और कद बिना पद के भी बड़ा हो सकता है। बच्चा बाबा, राज बहादुर पांडे, गुलाब सिंह खमरिया, बजरंग सिंह कमरिया - ये नाम सिर्फ व्यक्ति नहीं, एक जमाने की तहजीब थे।
आप चाहें तो मैं इसे "मदैनिया की चौपाल: 1960-1977" शीर्षक से एक लोक-संस्मरण की शक्ल में और विस्तार दे दूँ, जिसमें गाँव की पंचायतों और चुनावी किस्सों को भी जोड़ दूँ। क्या उस दौर की कोई खास घटना आपको याद है जिसे मैं इसमें पिरो दूँ? यदि आपको याद हो तो बताइएगा हमारे मेल पर !
ठीक है, अब उसी "मदै निया की चौपाल: 1960-1977" को एक खास घटना से जोड़ देते हैं। बुजुर्गों की जुबानी सुनी वो घटना आज भी मिसाल बनकर सुनाई जाती है।
घटना: 1972 की पंचायत और "हुक्के वाली सुलह"
बात 1972 की है, इमरजेंसी से ठीक 3 साल पहले। मदै निया और खमरिया की सीमा पर "गोहरा पोखरा" को लेकर विवाद छिड़ गया। बरसात में मेड़ टूट गई और दोनों तरफ के किसान अपनी-अपनी कहने लगे। बात बढ़ते-बढ़ते थाने तक पहुँच गई।
कांग्रेस के गुलाब सिंह खमरिया अपने "गोल" उदय राज सिंह मुबारकपुर अंजन के साथ खड़े थे। उनका तर्क था - "पोखरा का पानी सदियों से खमरिया की तरफ बहा है।"
उधर जनसंघ के राज बहादुर पांडे मजानिया, बच्चा बाबा और उनके साथ रामदेव सिंह बभनपुरा, वासुदेव साव किछौछा सब मदै निया की मेड़ बचाने उतर गए। बजरंग सिंह कमरिया का "गोल" तेज प्रताप सिंह सिकरौरा समेत पूरे इलाके में डुग्गी पिट गई - "कल चौपाल, फैसला वहीं होगा।"
गाँव वाले डर गए कि अब लाठी चलेगी। मदन सिंह जयती, राम मूरत डूबे बसखारी, जय राम सिंह अहिरौली रानी मऊ - ये दबंग लोग बीच-बचाव में आए। सर मुख सिंह मुबारकपुर अंजन और बीपत तिवारी बालीपुर ने तय किया कि खून-खराबा नहीं होने देंगे।
अगली सुबह बरगद की चौपाल पर 200 से ज्यादा लोग जुटे। एक तरफ गुलाब सिंह खमरिया, दूसरी तरफ राज बहादुर पांडे। दोनों ने 2-2 घंटे तक तर्क दिए। बच्चा बाबा बीच-बीच में "मर्यादा" की बात करते। बजरंग सिंह कमरिया और शमशेर सिंह चांदीपुर गवाह बने।
फैसला नहीं हो रहा था। तभी उदय राज सिंह मुबारकपुर अंजन उठे। वो गुलाब सिंह के आदमी थे, पर जमीन से जुड़े थे। उन्होंने कहा - "पोखरा न खमरिया का, न मदै निया का। पोखरा गाँव का है। मेड़ आधी-आधी बाँट लो। पानी दोनों पियो। फसल दोनों काटो।"
सन्नाटा छा गया। राज बहादुर पांडे जी ने हुक्का मँगाया। एक कश खुद ली, फिर हुक्का गुलाब सिंह खमरिया की तरफ बढ़ा दिया। गुलाब सिंह ने भी कश ली और बोले - "राज बहादुर, विचार अलग हैं, पर मिट्टी एक है।"
उसी दिन "हुक्के वाली सुलह" हो गई। न मुकदमा, न मारपीट। मेड़ बनी, पोखरा बचा, और रिश्ते भी बच गए। शाम को वासुदेव साव किछौछा ने दोनों खेमे के लिए गुड़-चना भिजवा दिया। तेज प्रताप सिंह सिकरौरा ने ऐलान किया - "अब से गोहरा पोखरा पर दोनों गाँव का हक।"
"उस घटना की सीख"
पुराने लोग आज भी कहते हैं - "उस दिन राजनीति हारी, इंसानियत जीती थी।" न बच्चा बाबा ने अपनी बात थोपने की जिद की, न गुलाब सिंह खमरिया ने ताकत दिखाई। दबंग थे, पर बदमाश नहीं। डर था, पर आतंक नहीं।
1977 के बाद जब इमरजेंसी हटी और राजनीति में कड़वाहट बढ़ी, तब भी बुजुर्ग इस "हुक्के वाली सुलह" को याद करके कहते - "देखो, बहस से रास्ता निकलता है, लाठी से नहीं।"
मदैनिया की मिट्टी में वो हुक्का आज भी गड़ा है - सबक के तौर पर। कि कद बड़ा वो नहीं जिसके पास लाठी है, कद बड़ा वो है जिसके बोल में वजन है।
- कवि सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
Sukhmangal Singh
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