*कहानी: "माटी की स्याही"*
_सुखमंगल सिंह के साहित्यिक परिचय पर आधारित_
अहिरौली रानी मऊ की पगडंडियों पर जब शाम उतरती, तो एक बूढ़ा बरगद तले बच्चों की भीड़ लग जाती। बीच में बैठे होते सुखमंगल सिंह — सफेद कुर्ता, कंधे पर गमछा, हाथ में कलम नहीं, मिट्टी सनी उंगली।
"बाबा, आज कौन सी कहानी?" एक नन्ही आवाज़ गूंजी।
सुखमंगल मुस्कुराए। "आज कोई कहानी नहीं बिटिया। आज तो हम माटी की स्याही से लिखेंगे।"
वे खेत की मेंड़ से गीली मिट्टी उठाते, और अपनी हथेली पर शब्द गढ़ने लगते। "देखो, ये है हमारा ग्राम्य-बोध। इस माटी में हल की रेखाएं हैं, औरतों के गीत हैं, बैलों के गले की घंटी है।" बच्चे हैरान थे। स्याही कहाँ है?
"तुलसी की मर्यादा और कबीर का सच — दोनों एक साथ जीना पड़ता है बेटा," वे कहते। "एक बार थानेदार आया था। बोला, 'मास्टर, सरकार के खिलाफ क्यों लिखते हो?' मैंने कहा, 'हुजूर, मैं तो वही लिखता हूँ जो मेरी क्यारी में उगा गेहूँ बोलता है। भूख का कोई धर्म नहीं होता।'"
वाराणसी के प्रेमचंद नगर कॉलोनी वाले घर में जब वे लौटते हैं, तो अलमारी सम्मान-पत्रों से भरी थी — पैगाम-ए-हिंद 2019, काशी काव्य सौरभ 2018, अटल रत्न 2021 आज लगभग 200 सम्मान। पर दीवार पर टंगा था सिर्फ " स्वर्ग विभा अंतरराष्ट्रीय ई पत्रिका मुंबई से डॉक्टर तारा सिंह राष्ट्रीय सम्मान 2025, हिंदी साहित्य भारती द्वारा
आजीवन सदस्यता प्रमाण पत्र, अनहद कृति द्वारा दिया गया मोमेंटो, डॉक्टर गोपाल दास नीरज द्वारा हस्त लिखित सम्मान , नादान परिंदे वाराणसी द्वारा सम्मान, मानसरोवर साहित्य अकादमी का सदस्यता पत्र।"
"ये सम्मान तो माटी ने दिए हैं," वे पत्नी उर्मिला से कहते। "मैंने तो बस उसकी खुशबू को शब्द दिए।"
एक दिन एक नवोदित लेखक आया। डरा-सहमा सा। "सर, मेरी रचनाएं कोई नहीं छापता। भाषा ग्रामीण है।"
सुखमंगल ने उसकी पांडुलिपि पढ़ी, और अपनी कलम से पहला शब्द लिखा — "प्रकाश्य"।
"बेटा, याद रखना," उन्होंने कहा, "जनपदीय स्वर ही भारत का असली स्वर है। कविता में अगर खेत की दरार न दिखे, तो वो कागज़ का फूल है — खुशबू कहाँ से लाएगा?"
आज सुखमंगल सिंह अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर में नहीं हैं। पर अहिरौली के उस बरगद तले अब भी बच्चे बैठते हैं। उनके बेटे डॉ अजीत, बेटी डॉ कीर्ति, अब उन कहानियों को किताबों में ढाल रहे हैं। और हाँ, मिट्टी की स्याही अब भी सूखी नहीं है।
क्योंकि जैसा कि उन्होंने लिखा है — "कवि मरते नहीं, वे माटी में घुलकर हर नए अंकुर में जन्म लेते रहते हैं।"
*समाप्त*
_यह कहानी सुखमंगल सिंह के जीवन-मूल्यों, ग्राम्य-चेतना और साहित्यिक योगदान से प्रेरित काल्पनिक कथा है।_
- डॉ सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
भारत
Sukhmangal Singh
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