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"क्षमा मांगने जाओ अयोध्या"

 

सुखमंगल सिंह, वाराणसी 

"क्षमा मांगने जाओ अयोध्या"  ओज-रचना प्रस्तुत है:-

"क्षमा मांगने जाओ अयोध्या"


क्षमा मांगने जाओ अयोध्या, राम की नगरी कहलाए,  

जहाँ सरयू की लहरों में, पाप भी धुलकर जाए।  

गलती चाहे कितनी बड़ी, यहाँ माफी मिल जाती है,  

राम का दरबार ऐसा, बैरी भी गले लग जाता है।  


राजा हो या रंक, यहाँ सब बराबर माने जाते,  

मर्यादा की धरती पर, रिश्ते फिर से सज जाते।  

जिसने तोड़ा दिल किसी का, वो यहाँ झुक जाता है,  

"भूल हुई प्रभु" कहकर, मन का बोझ घट जाता है।  


अयोध्या सिखाती हमको, अहंकार को छोड़ दो,  

क्षमा वीरों का भूषण, ये गाँठ मन की तोड़ दो।  

राम ने रावण को भी, अंत समय माफ किया,  

तो हम क्यों नफरत पालें, मन में बैर नशा किया।  


आओ सरयू में डुबकी, मन की मैल मिटा लो,  

क्षमा मांग लो अपनों से, रिश्तों को फिर जगा लो।  

क्षमा मांगने जाओ अयोध्या, वो दिलों को जोड़ती है,  

रामराज की परिभाषा, यही हमें मोड़ती है।  

- सुखमंगल सिंह 


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