Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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किनारों पर उतरते हुए

 
किनारों पर उतरते हुए

सूरज ने जब पाँव भिगोये, लहरों ने चूम लिया आकाश, 
रेत पर बिखरी सीपी बोली, अब थम जाओ थोड़ा पास। 
नाव खाली लौटी है फिर, मछुआरे की आँख उदास, 
जाल में फँसी उम्मीदें बोझिल, साँसों में नमकीन मिठास। 

मैं किनारे पर उतर रहा हूँ, लेकर अपने टूटे सवाल, 
हर लहर पूछती है मुझसे, क्या पाया तूने इस साल? 
पैरों के नीचे इतिहास है, हर कण में दबी कोई बात, 
दूर कहीं कोई दीपक टिमटिम, देता है अनजानी सी रात। 

सीने में ज्वार भरा है फिर भी, आँखों में भाटा ठहरा, 
लौटना चाहूँ उस लहर तक, जहाँ पहली बार था बहका। 
किनारे सिर्फ जगह नहीं होते, ये मन के ठहरे पल हैं, 
जहाँ आकर सब बह जाते हैं, और हम खाली-खाली कल हैं। 

अब अलाव जलेगा रेत पर, सिकेंगी यादें थोड़ी देर, 
फिर उठेंगे, फिर चल देंगे, छोड़ किनारा अपनी टेर।।

डॉ .सुखमंगल सिंह
 वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
 वाराणसी 


Sukhmangal Singh

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