कर्म धर्म शब्द व्यर्थ है,
जब तक मन में द्वेष है।
कर्म धर्म का मर्म नहीं,
जब तक मन में अहंकार है।
कर्म धर्म का अर्थ नहीं,
जब तक मन में लोभ है।
कर्म धर्म का फल नहीं,
जब तक मन में मोह है।
कर्म धर्म का सार नहीं,
जब तक मन में क्रोध है।
कर्म धर्म का हार नहीं,
जब तक मन में माया है।
कर्म धर्म का त्याग नहीं,
जब तक मन में आसक्ति है।
कर्म धर्म का योग नहीं,
जब तक मन में वैराग्य है।
कर्म धर्म का फल मिलेगा,
जब मन में प्रेम होगा।
कर्म धर्म का सार मिलेगा,
जब मन में शांति होगी।।
- सुख मंगल सिंह
वाराणसी
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