Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"कानून सबके लिए!"

 

"कानून सबके लिए!"

कानून की किताब सबके लिए, बनी है।  
तराजू एक ही, पलड़े दो नहीं होने चाहिए।  

आम जनता पर डंडा, नेता पर रियायत नहीं।  
गलती करे जो भी, सजा सबको बराबर मिले।  

गरीब की आँख में आँसू, और अमीर को छूट नहीं।  
सत्ता के नशे में, संविधान को भूलना नहीं।  

नेता भी नागरिक है, कानून से ऊपर नहीं।  
जिस कुर्सी पर बैठे, उसी की मर्यादा निभाए।  

चौराहे पर खड़ा सिपाही, सबको एक नजर देखे।  
VIP की गाड़ी भी, सिग्नल पर रुके।  

देश तभी आगे बढ़ेगा, जब न्याय अंधा होगा।  
ना जात देखे, ना पद, ना चेहरा पहचाने।  

कानून अगर कमजोर पड़ा, तो लोकतंत्र रोएगा।  
इसलिए हे भारत, नियम सब पर लागू हो।

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
 वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत।

 ये सीधा और सख्त संदेश वाली रचना है। मंच पर ओज के साथ पढ़ी जा सकती है! 




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