"कलम"
साल 1967 की बात है। गाँव मुबारकपुर अंजन जनपद फैजाबाद में मास्टरजी की टूटी-फूटी पाठशाला थी। बेंच-टेबल नहीं, बस फटी दरी और एक काला तख्ता। मास्टरजी के पास स्याही की दावात और एक लकड़ी की कलम थी - निब लोहे की, मुठिया बाँस की।
उसी पाठशाला में रामू पढ़ता था। माँ-बाप खेतिहर मजदूर। घर में न कापी थी न पेंसिल। रामू रोज तख्ती पर कोयले से लिखता, फिर मिटा देता। कभी-कभी तो उसे समय क्रूड आयल का दीपक जलाया जाता था इस दीपक की लव से निकली हुई कालिक को शीशे की दावत में घोलकर लिखना था। मास्टरजी की कलम को दूर से ताकता रहता। उसकी सबसे बड़ी हसरत थी - "काश मेरे पास भी कलम होती"।
एक दिन मास्टरजी बीमार पड़ गए। महीना भर पाठशाला बंद। जब लौटे तो उनकी कलम गायब थी। सबने ढूंढा, मिली नहीं। मास्टरजी की आँखें भर आईं। बोले - "ये कलम मेरी नहीं, मेरे गुरुजी की निशानी थी। इससे मैंने हजारों बच्चों को अक्षर सिखाए थे"।
रामू ने चुपके से देखा। कलम उसके पास थी। उसी रात को वो खेत पर काम करते वक्त गिरी पड़ी मिली थी। लोभ में उठा ली थी। अब डर के मारे किसी को बता न सका। रात-रात भर वो कलम को तकिए के नीचे रख कर सोता। कापी न थी तो पुराने अखबार के कोने पर अक्षर बनाता। "अ से अनार, आ से आम"। लिखते-लिखते उसकी उँगलियाँ काली पड़ जातीं, पर आँखें चमकती थीं।
3 महीने बीत गए। स्कूल में निबंध प्रतियोगिता हुई। विषय था "मेरा सपना"। सब बच्चे पेंसिल से लिख रहे थे। रामू के पास कुछ न था। तभी मास्टरजी ने भीड़ में उसे देखा। हाथ में अखबार का टुकड़ा और... वही लकड़ी की कलम।
मास्टरजी का चेहरा सख्त पड़ गया। रामू को लगा अब मार पड़ेगी। वो काँपते हाथों से कलम बढ़ाने लगा। मास्टरजी ने कलम ली, उसकी निब को देखा, फिर रामू की आँखों में झाँका। वहाँ डर नहीं था, वहाँ जुनून था। अखबार के टुकड़े पर लिखा था - "मेरा सपना है कि मेरे गाँव का हर बच्चा लिखे। मैं बड़ा होकर मास्टर बनूँगा। सबको कलम दूँगा"। अक्षर टेढ़े - मेढ़े थे, पर स्याही दिल की थी।
मास्टरजी ने कुछ नहीं कहा। बस रामू का हाथ पकड़ कर मंच पर ले गए। कलम उसकी हथेली पर रख दी। बोले - "बेटा, कलम चोरी नहीं की जाती, कमाई जाती है। आज से ये तेरी हुई। पर वादा कर, इससे तू कभी झूठ नहीं लिखेगा, कभी किसी का दिल नहीं दुखाएगा"।
रामू फूट-फूट कर रो पड़ा। उस दिन उसे मार नहीं, आशीर्वाद मिला था।
3साल बाद 1970 में अहिरौली रानी मऊ में एक नया प्राइमरी स्कूल खुला। उद्घाटन करने आए थे जिला शिक्षा अधिकारी । भाषण में उन्होंने जेब से वही पुरानी लकड़ी की कलम निकाली। बोले - "ये कलम मेरी गुरु-दक्षिणा है। जिसने मुझे सिखाया कि कलम तलवार से ताकतवर होती है। आज मेरे स्कूल में 100 बच्चे हैं। हर बच्चे के पास एक कलम है। क्योंकि कलम देने से ज्ञान बँटता नहीं, बढ़ता है"।
भीड़ में सबसे आगे बैठे थे बूढ़े मास्टरजी। आँखों में आँसू थे। उन्होंने धीरे से कहा - "देखा रामू, कलम ने तुझे चोर से शिक्षक बना दिया। बस नियत साफ होनी चाहिए"।
आज भी उस स्कूल की हर क्लास में एक तख्ती टँगी है। उस पर लिखा है - "कलम से लिखो, पर दिल से सोचो। क्योंकि जो दिल से निकलता है, वही इतिहास बनता है"।
और वो लकड़ी की कलम? वो अब काँच के फ्रेम में सजी है। उसके नीचे लिखा है - "ये कलम नहीं, एक पीढ़ी की चिंगारी है"।
सुख मंगल सिंह,
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
मौलिक स्वरचित कहानी
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