"कारगिल विजय दिवस"
सियाचिन की बर्फ चीखी, दुश्मन ने घुसपैठ की ठानी ,
हिमालय का माथा झुका, पर हिंद की शान नहीं हारी ।
तिरंगा लहराया ऊंचाई पर, लहू से रंगी चोटियां ,
वीरों ने कसम खाई, या विजय या वीरगति आनी ।
बोफोर्स गरजा पहाड़ों में, गूंज उठी घाटी सारी ,
हर गोले के साथ निकली, माँ भारती की हुँकार भारी ।
टाइगर हिल पे परचम फहरा, दुश्मन के पांव काँपे ,
बेटे लौटे घर से ऐसे, जैसे काल को ललकारे !
धूप नहीं, गोलों की वर्षा, फिर भी हौसला कम न हुआ,
भूख-प्यास सब भूल गए, जब देश का नाम रटना हुआ।
कैप्टन बत्रा चीख पड़े, "ये दिल मांगे मोर" ,
विक्रम ने दुश्मन को बताया, क्या होती है हिन्द की डोर।
माताओं ने राखी बाँधी, पर कलाई सूनी रह गई ,
बहनों की मेहंदी फीकी, पर सिंदूर की लाली महक गई ।
जो लौटे वो नायक बने, जो गए वो अमर कहाए ,
कारगिल की हर चट्टान पर, शौर्य के गीत गाए ।
आज भी जब याद आती, वो 26 जुलाई की रात ,
सीना गर्व से फूल जाता, आंखें हो जाती नम ,
सिर झुका कर नमन करें, उन शहीदों के नाम,
जिनकी कुर्बानी से आज, हम चैन से लेते हैं दम।।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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