"ज़िंदगी झमेला"
नाम से जिसके चलता रेला,
उसी नाम से ठेलम ठेला!
बच्चे करते नहीं झमेला,
लगता बस बच्चों का मेला।
सार समय का सबने झेला,
कौन समझ पाया यह खेला।
बाज़ारू बन रहा अकेला,
अपने गैर का है रेला।
शिखर को भी खाई में ढकेला,
सिंहासन पर बैठा अकेला।
भार समाज का जिसने झेला,
उसका साथ नहीं, वह अकेला।
नाम बड़ा पर काम है ठेला,
नोटों में ही उलझा झमेला।
भीड़ में भी मन है अकेला,
हर चेहरे पर स्वार्थ का मेला।
बस्ती-बस्ती फिरता रेला,
भूख का हर दिन नया झमेला।
सच को जिसने सदा ही झेला,
झूठ ने उसको खूब ही ठेला।
जीवन भर का यही झमेला,
आना-जाना लगा ही रेला।
मंगल कहे समझ लो खेला,
हँस कर जीना ही है अकेला।।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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