
| Wed, Sep 9, 3:55 PM (13 hours ago) | |||
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"जौहर"
चित्तौड़ के किले से उठी, वो ज्वाला थी जौहर की,
रानी पद्मिनी ने लिखी, अमर कथा है गौरव की।
खिलजी खड़ा था द्वार पर, आँखों में प्यास पाले,
पर सिंहनी झुकी नहीं, देख जौहर की ज्वाले।
सोलह श्रृंगार सजाकर, जब दुल्हन सी निकलीं,
मौत भी घूंघट ओढ़े, उनके पीछे चल निकली।
माँ ने बेटी को समझाया, आन पे मर जाना है,
मिट्टी में मिल जाना पर, शीश नहीं झुकाना है।
अग्नि कुंड ने पूछा भी, क्या तुझे जलन होगी,
रानियों ने कहा हमें, अब स्वर्ग में चैन होगी।
जौहर कोई मरना नहीं, ये व्रत है श्रृंगार का,
मिटकर भी जो अमर करे, नाम वो हर नारी का।
चित्तौड़ आज भी महकता, उस राख के फूलों से,
काशी कहे 'मंगल' सुनो, सीखो उन भूलों से।
चित्तौड़ गढ़ के किले से उठी, वो ज्वाला थी जौहर की,
रानी पद्मिनी ने लिखी, अमर कथा है गौरव की।।
मौलिक स्वरचित रचना
- डॉ.सुख मंगल सिंह/ वाराणसी
Sukhmangal Singh
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