जार जार हो रहा
बनते हमने कल तक
पूरा देखा परिवार।
मेल जोल आपसी
रहता अच्छा व्यवहार।
कर्मों में सभी अपने
कोई नहीं बेकार।
रही पुष्ट बल बुद्धि
परिवार नहीं लाचार।
करवट ली गति काल
बिखरे सारे तार।
बदली बल बुद्धि ज्ञान
झंझर हो गया ज्वार।
जब मन मलिन हुआ
देखा पूरा संसार।
शनि के कुपित होते ही
बदल जाता विचार।
प्रभाव दुखों का पड़ता
मन जब होता खार।
वर्तमान भूलने लगता
रोता खुलकर सियार।
इतिहास व भूगोल
जन मन बैठा गवार।
नवीन निर्माण शैली
पलता कुटुंब खार।
बिखरे टुकड़ों में जैसे
प्यासी नदी किनार।
सौंदर्य के मुखडे छीड़
खासा बड़ा विकार।
आकर्षण - अध्ययन
वा दर्शनीय त्योहार।
विनाशक रुपांतरित
स्वयं क इतिहासकार।।
- सुख मंगल सिंह
Sukhmangal Singh
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