*जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि*
जहाँ न पहुँचे रवि की किरण,
जहाँ न पहुँचे सत्ता का कर,
जहाँ दीवारें ऊँची हैं,
और कान बहरे हैं दर-दर,
वहाँ कवि की कलम पहुँचती,
लेकर शब्दों का अम्बर।
मैं कवि हूँ, मैं मेघ बनूँगा,
तुलसी की रीत अपनाऊँगा,
गाँव-गाँव, डगर-डगर जाकर
सोई पीड़ा को जगाऊँगा।
न कोई दूत, न कोई डाकिया,
मैं छंदों में संदेशा लाऊँगा।
मैं देखूँगा उस घर को,
जहाँ चूल्हा बिन आग जले,
मैं सुनूँगा उस बेटी का,
सपना जो कोख में ही गले।
मैं लिखूँगा उस हाथ पर,
जिसने हल छोड़ा, कलम गहने।
कवि की स्याही में आग है,
जो सर्द लोहे को पिघलाए,
कवि की वाणी में बयार है,
जो टूटी नाव को पार लगाए।
ये सत्ता से नहीं डरती,
ये सच को सच कहकर दिखाए।
जब न्याय के दरवाजे पर,
लग जाए जंग की जंजीर,
तब कविता हथौड़ा बनकर,
तोड़ देगी हर तकदीर।
जब भाई को भाई से बाँटे,
धर्म-जाति की दीवारें,
तब कविता सेतु बनकर,
जोड़ देगी सब गलियारे।
मैं कहता हूँ हर कलम से,
"उठो, लिखो, रुको नहीं",
तुम्हारा एक शब्द भी,
किसी का सूरज हो कहीं।
अँधेरा घना बहुत है,
पर हार मानो नहीं।
तुलसी ने राम को जन-जन तक,
चौपाई में बाँध पहुँचाया,
आज फिर जरूरत है,
कलम को रामबाण बनाया।
चलो उठो ऐ कलमकारों,
समय ने तुम्हें बुलाया।
जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि,
यही हमारा प्रण है,
जब तक एक भी आँसू बाकी,
कविता का धर्म है।
चिराग की लौ बनकर,
जलते रहना कर्म है।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी अवध निवासी अंबेडकर नगर जनपद उत्तर प्रदेश
*भाव*: कवि समाज का
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY