"जगराता"
"माँ के जगराते में"
माँ के जगराते में, शब्दों की ज्योति जलने दें,
आज निशा है भक्ति की, भजन में रात ढलने दें।
ढोलक थाप, मजीरे बजे, दरबार सजा है प्यारा,
लाल चुनरिया वाली मैया, कर देगी बेड़ा पारा।
ज्योत जली है अखंड, तेल नहीं श्रद्धा का है,
हर कोने में गूँज रहा, बस नाम माँ का है।
नंगे पाँव जो आया, उसने सब कुछ पाया है,
मैया ने अपने भक्तों को, गले से लगाया है।
न कोई ऊँचा नीचा, न कोई छोटा बड़ा है,
माँ के जगराते में सबका, एक ही कुनबा खड़ा है।
जिसने सारी रात जगकर, माँ की महिमा गाई है,
समझो उसने जीवन की, सच्ची खुशी पाई है।
आओ कविता' मंगल 'के इस, पावन मंच पर गाते हैं,
शब्दों के दीप जलाकर, माँ का जगराता मनाते हैं।
जय माता दी!
डॉ .सुखमंगल सिंह/ वाराणसी
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