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"जब शासक अन्याय पर मौन हो जाए"

 

कवियों ने इस विषय पर बहुत कठोर और सीधी बात कही है !

"जब शासक अन्याय पर मौन हो जाए" - इस पर हिंदी, ब्रज और संस्कृत के कवियों ने चेतावनी दी है।

1. तुलसीदास जी - रामचरितमानस में -
सबसे प्रसिद्ध चौपाई यही है:

 "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।  
सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥"

अर्थ: जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी है, वो राजा निश्चित ही नरक का अधिकारी है।

और भी:
    "बिप्र निरक्षर लोलुप कामी।  
नृप कुटिल कलि कपटी सामी॥"
 
कलियुग में राजा कुटिल, कपटी और स्वार्थी हो जाएंगे।

2. कबीर दास जी
कबीर ने शासक और समाज दोनों को लताड़ा:-

 "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।  
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥"
  
मतलब: बड़ा पद पाकर भी अगर प्रजा की रक्षा न करे तो उस पद का क्या फायदा।

  "काजी मुल्ला भिस्तरा, एकै माला दोय।  
दिल में कपट कुदृष्टि है, ता घर कबहुं न होय॥"
 
जो अन्याय देखकर भी मौन है, उसके घर धर्म कभी नहीं आएगा।

 3. रहीम जी!
रहीम ने नीति में लिखा:

   " रहिमन राजा एक है, जो सबको दे दान।  
जो राजा अन्याय करे, सो राजा शैतान॥" 

 "बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोलें बोल।  
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल॥"
सच्चा राजा गुण से बड़ा होता है, पद से नहीं।

    4. भारतेन्दु हरिश्चंद्र
अंग्रेजों के समय में उन्होंने सीधे कहा:

    " अंधेर नगरी चौपट राजा,  
टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥"

जहां अन्याय का दाम और न्याय का दाम एक हो जाए, वो राज्य अंधेर नगरी है।

"भीतर-भीतर सब रस चूसे, बाहर से हितकारी।  
राजा प्रजा को दोनों ठगते, देखें मूक पुजारी॥"

5. मैथिलीशरण गुप्त - भारत-भारती
"हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी।  
आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी॥"
 
गुप्त जी ने कहा कि जब शासक सो जाए तो प्रजा को जगना पड़ेगा।

  " निज भाषा, निज धर्म की, जो रखता है मान।  
वही सच्चा राजपूत है, वही राष्ट्र की शान॥"

6. रामधारी सिंह दिनकर - रश्मिरथी
दिनकर ने क्रांति की भाषा में कहा:

"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।  
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध॥"
 
अर्थ: अन्याय के समय जो चुप है, वो भी पाप का भागी है। इतिहास उसे माफ नहीं करेगा।

7. सूरदास - भक्ति के साथ नीति-

"अबिगत गति कछु कहत न आवै।  
ज्यों गूंगे केरी मिठाई, खाए बिनु स्वाद न आवै॥"

अर्थ: अन्याय सहने वाला गूंगे जैसा है। दर्द है पर बोल नहीं सकता।
कवि सुखमंगल सिंह ने कहा-
  " ना जो भगवान का नहीं होता ,वह मानव - पुतला होता।" 


" सार: कवियों का एक ही स्वर
कवि-संदेश:
तुलसी: दुखी प्रजा वाला राजा नरकगामी है
कबीर: पद बड़ा हो पर कर्म छोटा हो तो व्यर्थ है
रहीम: अन्यायी राजा = शैतान
भारतेन्दु: अंधेर नगरी = चौपट राजा
दिनकर: तटस्थ रहना भी अपराध है
कवि सुख मंगल सिंह: स्वर्ग नरक की सीढ़ियां चलती साधन साथ, चुनार जैसा करे तू है सो न वैसा फल पाय।
" कवियों ने एक ही बात कही:" 
राजा का मौन तलवार से ज्यादा घातक है। और प्रजा का मौन उस तलवार को धार देता है।


विषय: "राजा का मौन और प्रजा का जागरण"

(शुरुआत - 20 सेकंड)
आदरणीय अध्यक्ष जी, गुरुजन और मेरे साथियों!  
आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करूंगा जो हमारे शास्त्रों में हजारों साल पहले लिखा जा चुका है।  
हमारे ऋषि कहते हैं - "राजा राष्ट्र की आत्मा है"  और अगर आत्मा ही रोगी हो जाए तो शरीर कैसे बचेगा?

[पहला दोहा + बात - 20 सेकंड] 
तुलसीदास जी ने बहुत पहले कह दिया था: -

 "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।  
सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥"
  
अर्थात जिस राजा के राज में प्रजा दुखी है, वो राजा नरक का अधिकारी है!
आज अगर चोरी, अन्याय पर शासन मौन है तो समझिए "मत्स्य न्याय" शुरू हो चुका है।

[दूसरा दोहा + उदाहरण - 25 सेकंड]

महाभारत में भीष्म पितामह ने "मत्स्य न्याय" की कथा सुनाई।  
    "दण्ड बिना जो राज है, वो डाकू सम जान।  
      छोटी मछली खात है, बड़ी मछली महान॥" 
जब तालाब का बगुला सो जाता है, तो बड़ी मछली छोटी को खा जाती है।  
ठीक वैसे ही जब शासक आंख बंद कर लेता है, तो बलवान कमजोर को दबा देता है।

[तीसरा दोहा + चेतावनी - 25 सेकंड]
 
और सबसे बड़ी बात - हमारा मौन भी पाप है। 
 
गरुड़ पुराण कहता है और कवि भी यही कहते हैं:-
 "चुप रह जो अन्याय को, पापी वही कहाय।  
पाप का चौथा भाग है, शास्त्रन में समझाय॥"

रामधारी सिंह दिनकर जी ने भी कहा - "जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध"
कवि सुख मंगल सिंह ने कहा: "पाप छुपाता नहीं, समय देख उतरा जाता"

[समापन + आखिरी दोहा + नारा - 20 सेकंड]

इसलिए साथियों, अब और चुप नहीं रहना है।
  
  " उठो जागो बोलो अब, समय पुकारे तोय।  
     धर्म बचेगा देश बचे, चुप रहना मत होय॥"  

आइए हम सब संकल्प लें - अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे।  
बोलिए मेरे साथ - "जय धर्म! जय सत्य! जय भारत माता की जय!" 
[धन्यवाद]
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश 




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