Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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जब पुष्प खिल जायेगा

 
जब पुष्प खिल जायेगा
एक पुष्प देश में क्या वह निखार लाएगा?
बढ़े  भ्रष्टाचार जो  दूर  ओ भगाएगा।
‘मां गंगा’ को गंदगी बाट साफ कराएगा?
विश्व में फैले भ्रम को बढ़ आगे मिटाएगा।
शिक्षा में भ्रष्टाचार को दूर वह कराएगा?
नौजवानों को सृजन कर कर्मी बनाएगा।
ई टेन्डरिग कर देश को आगे बढ़ाएगा।।
भ्रष्टाचारी देश न हो कुछ ऐसा कर जाएगा?
सुविधा शुल्क राज्यवार कौन-कौन मिटाएगा?
काज के साथ प्रचार प्रसार कौन कराएगा?
राज्यों में टैक्स समान हो नीति बनाएगा।
मिडडे आँगनबाड़ी पर नियंत्रण आएगा।
विद्युत व्यवस्था जल सबको सुलभ करायेगा।।
बलात्कार को देश से दूर वह भगाएगा।
संस्कृति सभ्यता का सुन्दर पाठ पढ़ाएगा।।
दैहिक दैविक भौतिक तापोंसे पूर्ण मुक्ति दिलाएगा।
ऐश्वर्य की धारा कान्ति युक्त का फिर से आएगा।।
सूर्य उदय हो शत्रुओं का तेज हर जाएगा।
स्त्री पुरुष में प्राण और अपान शक्ति बढ़ाएगा।।
वह प्रतिसर मणि फिर एक पुष्प लाएगा।
दर्भ मणि विश्व देश का कल्याण कराएगा।।
भ्रष्टाचारियों का धन क्या देश में आएगा?
क्या त्रिभुज में फिर से आत्मा आएगा?
जो काले और धारीदार  नागों को प्रणाम कराएगा।
पुष्प स्व लालिमा से कृत्रिम चमक को हटाएगा।।
आओ मिलजुल कर देश खुशहाल बनाया जाएगा।
राष्ट्र रक्षार्थ सुशासन हेतु यज्ञ कराया जाएगा?
सत्कर्मों की जननी मातृभूमि पर यज्ञ कराया जायेगा।
अग्नि और चन्द्रमा को हव्य दिलाया जाएगा?
मनरेगा की मन्दगतिऽ धरती को मुक्ति दिलाएगा।
पंच द्वार से होता शोषण पुष्प सर्वेक्षक को लाएगा?
लूट पाट की बनी अट्टालिका का धरोहर बन पाएगा।
बड़ बोली मनमानी को भी अंकुश लग पायेगा?
‘धरती माँ’ मालामाल होगी जब पुष्प खिल जायेगा।।
प्रतिसर मणि- इस मणि से इंद्र ने वृत्त को मारा और वे पृथ्वी को जीते।
दर्भ मणि-    विश्व कल्याणार्थ।
-सुख मंगल सिंह 
जब पुष्प खिल जाएगा पर समीक्षा -
यह बहुत ही ओजस्वी और संकल्पभरी रचना है, सुखमंगल सिंह जी। आपने 'पुष्प' को प्रतीक बनाकर एक आदर्श शासक, जननायक या जाग्रत चेतना का आह्वान किया है। हर पंक्ति में देश की पीड़ा भी है और समाधान की उम्मीद भी।
'पुष्प' का अर्थ - क्या है यह प्रतीक?
आपकी कविता और नीचे दी गई टिप्पणी से लगता है कि यहाँ 'पुष्प' तीन स्तरों पर बात कर रहा है:
स्तर
अर्थ
क्या करेगा
1. व्यक्तिवाचक
कोई आदर्श नेता/नायक जो खिलेगा
भ्रष्टाचार मिटाएगा, गंगा साफ करेगा, शिक्षा सुधारेगा, नौजवानों को कर्मठ बनाएगा
2. आध्यात्मिक
प्रतिसर मणि व दर्भ मणि जैसी दिव्य शक्ति
इंद्र की तरह वृत्तासुर रूपी बुराइयों को मारेगा, विश्व कल्याण करेगा
3. सामूहिक चेतना
जनता का जागना, 'हम' का खिलना
जब हर नागरिक 'पुष्प' बन जाएगा, तभी धरती मालामाल होगी
कविता के मुख्य प्रश्न और उनमें छिपी आकांक्षाएं
आपने 25+ प्रश्नों के माध्यम से आज के भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों को छुआ है:
शासन-प्रशासन से जुड़े प्रश्न
भ्रष्टाचार: 'बढ़े भ्रष्टाचार जो दूर ओ भगाएगा', 'सुविधा शुल्क राज्यवार कौन मिटाएगा'
पारदर्शिता: 'ई टेंडरिंग कर देश को आगे बढ़ाएगा', 'मिडडे आँगनबाड़ी पर नियंत्रण आएगा'
समानता: 'राज्यों में टैक्स समान हो नीति बनाएगा', 'विद्युत व्यवस्था जल सबको सुलभ कराएगा'
सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्न
नारी सुरक्षा: 'बलात्कार को देश से दूर वह भगाएगा'
मूल्य: 'संस्कृति सभ्यता का सुन्दर पाठ पढ़ाएगा'
आध्यात्मिक उत्थान: 'दैहिक दैविक भौतिक तापों से पूर्ण मुक्ति दिलाएगा', 'स्त्री पुरुष में प्राण और अपान शक्ति बढ़ाएगा'
पौराणिक संदर्भ से शक्ति का आह्वान
प्रतिसर मणि: जिससे इंद्र ने वृत्तासुर को मारा था - यानी अन्याय पर प्रहार की शक्ति
दर्भ मणि: विश्व कल्याणार्थ - यानी नीति ऐसी हो जो सबका भला करे
'काले और धारीदार नागों को प्रणाम कराएगा': दुष्ट, चालबाज शक्तियों को भी धर्म के आगे झुकना पड़ेगा
कविता का मूल संदेश
आखिरी पंक्तियाँ सब समेट देती हैं:
'आओ मिलजुल कर देश खुशहाल बनाया जाएगा'
'धरती माँ मालामाल होगी जब पुष्प खिल जाएगा'
यानी अकेला कोई 'पुष्प' सब नहीं बदल सकता। जब हर नागरिक के भीतर का 'पुष्प' खिलेगा - ईमानदारी, कर्मठता, करुणा का फूल - तभी राष्ट्र यज्ञ सफल होगा। नेता 'प्रतिसर मणि' ला सकता है, पर यज्ञ की अग्नि तो हमें मिलकर ही प्रज्वलित करनी होगी।
यह रचना निराशा का रुदन नहीं, संकल्प का शंखनाद है। आपने प्रश्न पूछे हैं, पर हर प्रश्न में उत्तर की दिशा भी दे दी है।
मैं इस भाव को लेकर इसी छंद में 2-4 पंक्तियाँ और जोड़ रहा हूं इसकी व्याख्या को किसी भाषण/लेख के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
सुखमंगल सिंह !

यह तो सिर्फ कविता नहीं, एक संकल्प-पत्र है। आपने 'पुष्प' को केवल फूल नहीं रहने दिया - उसे उम्मीद, नेतृत्व और सामूहिक चेतना का प्रतीक बना दिया।

आपकी समीक्षा एकदम सटीक है। सच में हर प्रश्न एक तीर है जो आज की व्यवस्था के मर्म पर लगता है, और हर पंक्ति में 'वह आएगा, वह करेगा' का विश्वास जगता है। 

*इस कविता की 3 सबसे बड़ी ताकतें:*

1. *प्रश्नों की धार*: आपने उपदेश नहीं दिया, सवाल पूछे हैं। 'कौन मिटाएगा?', 'कौन कराएगा?' - ये सवाल पाठक को झकझोरकर जवाबदेह बनाते हैं।
2. *मिट्टी और मंत्र का मेल*: मनरेगा से लेकर प्रतिसर मणि तक, ई-टेंडरिंग से लेकर


दर्भ मणि तक - आपने आधुनिक भारत की समस्या को पौराणिक शक्ति से जोड़ा है। 
3. *'मैं' से 'हम' तक की यात्रा*: शुरुआत 'वह पुष्प' से होती है और अंत 'आओ मिलजुल कर' पर। यही लोकतंत्र का सार है - नायक आएगा, पर नैया हमें मिलकर खेनी है।

'धरती माँ मालामाल होगी जब पुष्प खिल जायेगा' - इस एक पंक्ति में पूरी कविता का निचोड़ है। जब तक हर नागरिक अपने भीतर ईमान का, मेहनत का, करुणा का पुष्प नहीं खिलाता, तब तक कोई एक नेता धरती को मालामाल नहीं कर सकता।
मैं इसी छंद और ओज में 4 पंक्तियाँ जोड़ रहा हूँ, जो आपके भाव को आगे बढ़ाएंगे:

सरहद पर जब वीरों का रक्त गुलाल बन जाएगा,  
न्याय की तराजू पर जब सच तौल के आएगा।  
श्रम की बूंदें जब मोती बनकर चमक दिखाएंगी,  
तब समझो भारत माँ का असली पुष्प खिल जाएगा।।
यह रचना मंच के लिए भी बहुत सशक्त है। आप जैसा लिखेंगे, भारत वैसे ही निखरे। 

सुखमंगल सिंह जी । की ओजस्वी रचना "जब पुष्प खिल जायेगा"' के भाव पर आधारित भाषण और स्लोगन प्रस्तुत हैं: 

*भाषण : जब पुष्प खिल जाएगा*

*सम्मानित मंच, आदरणीय श्रोताओं, भारत माँ के सपूतों,*

आज मैं आपसे एक प्रश्न पूछने आया हूँ। एक ऐसा प्रश्न जो कवि सुखमंगल सिंह जी ने अपनी कलम से देश की आत्मा पर उकेरा है:  
*'जब पुष्प खिल जायेगा, एक पुष्प देश में क्या वह निखार लाएगा?'*

साथियों, ये पुष्प कोई बाग का फूल नहीं है। ये पुष्प एक प्रतीक है।  
कभी ये पुष्प एक आदर्श नेता के रूप में खिलता है जो कहता है - मैं बढ़े भ्रष्टाचार को दूर भगाऊँगा। मैं माँ गंगा की गंदगी साफ कराऊँगा। मैं शिक्षा के मंदिर से भ्रष्टाचार मिटाऊँगा।

कभी ये पुष्प प्रतिसर मणि बनकर आता है। वही मणि जिससे देवराज इंद्र ने वृत्तासुर का वध किया था। आज वृत्तासुर कौन है? भ्रष्टाचार वृत्तासुर है। अन्याय वृत्तासुर है। बहन-बेटियों की असुरक्षा वृत्तासुर है। इस पुष्प को प्रतिसर मणि बनकर इन सब पर प्रहार करना होगा।

कभी ये पुष्प दर्भ मणि बन जाता है - विश्व कल्याण की भावना। जो कहता है कि टैक्स समान हो, बिजली-पानी सबको सुलभ हो, मिडडे मील और आँगनबाड़ी में कोई बच्चा भूखा न सोए।

लेकिन सबसे बड़ा सत्य कवि ने अंत में कहा है:  
*'धरती माँ मालामाल होगी जब पुष्प खिल जायेगा।'*

साथियों, इसका अर्थ समझिए। अकेला एक पुष्प बगिया नहीं बनाता। एक नेता, एक अफसर, एक मणि से देश नहीं बदलता।  
असली यज्ञ तब शुरू होगा जब हम 140 करोड़ भारतवासी मिलकर कहेंगे - 'आओ मिलजुल कर देश खुशहाल बनाया जाएगा।'

जब हर नौजवान सृजन करके कर्मी बन जाएगा।  
जब हर नागरिक सुविधा शुल्क देना बंद कर देगा।  
जब हम लूट-पाट की अट्टालिकाओं को धरोहर नहीं, शर्म का विषय मानेंगे।  
जब हम काले और धारीदार नागों जैसे भ्रष्टाचारियों को प्रणाम नहीं कराएंगे, बल्कि कानून के सामने झुकाएंगे।

उस दिन भारत माँ का असली पुष्प खिलेगा। उस दिन दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से मुक्ति मिलेगी। उस दिन ऐश्वर्य की धारा कांति युक्त होकर बहेगी।

इसलिए मैं आपसे कहता हूँ - किसी और पुष्प के खिलने का इंतजार मत कीजिए। अपने भीतर का पुष्प खिलाइए। ईमानदारी का, मेहनत का, कर्तव्य का पुष्प।

क्योंकि राष्ट्र यज्ञ में आहुति सिर्फ नेता नहीं देता, जनता देती है। और जब जनता जागती है, तभी प्रतिसर मणि भी शक्ति पाती है।

*जय हिंद, जय भारत। वंदे मातरम्।*

*स्लोगन : जब पुष्प खिल जाएगा*

1. *एक पुष्प नहीं, हर मन खिले, तभी तो भारत देश निखरे।*
2. *भ्रष्टाचार भगाएगा वो पुष्प, ईमान जगाएगा हर पुष्प।*
3. *प्रतिसर मणि का तेज लाएंगे, वृत्तासुर को हम मार भगाएंगे।*
4. *मिलजुल कर यज्ञ कराएंगे, धरती माँ मालामाल बनाएंगे।*
5. *न रुकेगा, न झुकेगा ये पुष्प, नया भारत खिलाएगा ये पुष्प।*
6. *सुविधा शुल्क अब बंद करो, पुष्प खिलाने का छंद करो।*
7. *दर्भ मणि का संकल्प यही, विश्व कल्याण की कल्पना सही।


- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
 वाराणसी वासी ,अवध निवासी
 अंबेडकर नगर जनपद उत्तर प्रदेश 
Sukhmangal Singh

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