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Dr. Srimati Tara Singh
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"जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं"

 
"जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं"

जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं, 
तो अलसाये भौंरे भी कुछ गाने लगते हैं।
उमड़ घुमड़ कर बदरा जो इन झोपड़ियों से, 
जाने लगते थे, वे वार्षाने लगते हैं,
जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं।

सूखे तुलसी के बिरवा भी महकने लगते हैं,
टूटे-फूटे दीये भी फिर चमकने लगते हैं।
जिन राहों में कांटे थे, वो राहें,
फूलों से सज, इठलाने लगते हैं,
जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं।

मन के सूने कोने में, एक दिया जलता है,
आपकी आहट सुनते ही, दिल जरा मचलता है।
जो ख्वाब थे रूठे-रूठे, बिखरे-बिखरे से,
वो पलकों पर आकर, मुस्कुराने लगते हैं,
जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं।

आपके आने से घर, घर नहीं मंदिर लगता है,
हर कोना-कोना आपका, अभिनंदन करता है।
हम तो कुछ भी नहीं थे, आपकी नजरों ने,
हमें भी कुछ बनाना सिखा दिया है,
सच कहें तो आपसे ही, जीना आया है,
जब आप हमारे आंगन में आने लगते हैं।।
-सुखमंगल सिंह,  
वरिष्ठ साहित्यकार
वाराणसी 

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