"इम्तहान कब तक देंगे हम"
ओज -शैली,
इम्तहान कब तक देंगे हम, ये सवाल अब पुराना है,
हर सुबह उठकर जिंदगी से जंग लड़ना दस्तूराना है।
कभी भूख का इम्तहान, कभी गरीबी का सवाल खड़ा,
कभी रिश्तों की अग्नि परीक्षा, कभी सपनों का कतरा-कतरा।
कागज-कलम वाले इम्तहान तो एक दिन बीत जाते हैं,
जो रोज जीने का इम्तहान है, वो उम्र भर साथ आते हैं।
बिजली गुल है, पर पढ़ना है लालटेन की लौ में,
किस्मत सोई है, उसे जगाना है अपनी बाहों में।
गिरकर उठना सीख लिया, अब हार से डर कैसा?
चोट खाकर भी हँस देना, वीर का यही बसेरा।
दुनिया पूछती है अंक कितने, नंबरों का खेल है,
हम पूछते हैं जज्बा कितना, हौसले का मेल है।
माँ की आँखों का कर्ज है, पिता के पसीने का हिसाब,
इम्तहान ये नहीं कि पास हों, इम्तहान ये कि ना टूटे ख्वाब।
ताने सुन-सुनकर कान पक गए, पर जुबाँ बंद रखी है,
जबाब देने का वक्त आएगा, मेहनत की आग रखी है।
रातें काली हैं तो क्या, हम उजाले के बीज बोएँगे,
पत्थर बनकर भी अपना मुकद्दर खुद तराशेंगे।
फेल हो जाएँ एक बार तो दुनिया तमाशा देखेगी,
हम उठकर फिर चलेंगे, यही जिद्द हमें जीना सिखाएगी।
इम्तहान देते-देते ही तो इंसाँ इंसाँ बनता है,
सोने को भी भट्टी में तपकर ही कुंदन बनता है।
डर मत, घबरा मत, ये वक्त भी गुजर जाएगा,
जो आज इम्तहान ले रही, कल खुद तेरा सिक्का चल जाएगा।
कब तक देंगे इम्तहान? जब तक साँस की डोरी है,
जब तक दिल में आग है, तब तक जंग जारी है।
इम्तहान ही तो जीवन है, इम्तहान ही पहचान है,
जो झेल गया आँधी -तूफाँ, वही तो हिंदुस्तान है॥
डॉ. सुखमंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी
Sukhmangal Singh
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY