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"हिंदी दिवस पर विशेष आलेख - एक चिंतन"
हर साल 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। फिर 15 सितंबर को सब कुछ वैसा ही हो जाता है। अंग्रेजी के स्कूल, अंग्रेजी की फाइलें, अंग्रेजी का मोह। सवाल यह है कि क्या हिंदी दिवस सिर्फ एक औपचारिकता बन कर रह गया है?
हिंदी दिवस का इतिहास हमें बताता है कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। यह कोई खैरात नहीं थी, यह करोड़ों भारतीयों की आत्मा की आवाज थी। गांधी जी ने कहा था - "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।" हिंदी सिर्फ भाषा नहीं है, वह इस देश का स्वर है।
आज हिंदी कहाँ खड़ी है? आंकड़े गर्व कराते हैं। दुनिया में 60 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी समझते हैं, बोलते हैं। हिंदी फिल्मों का बाजार 5000 करोड़ का है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक पर हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स लाखों कमा रहे हैं। एक समय था जब हिंदी के लेखक को प्रकाशक नहीं मिलता था, आज हिंदी की किताब अमेजन पर बेस्टसेलर बनती है।
पर एक दूसरा सच भी है जो चुभता है। आज भी हमारे माता-पिता अपने बच्चे का एडमिशन अंग्रेजी मीडियम में कराने के लिए लाइन में लगते हैं। आज भी इंटरव्यू में हिंदी बोलने वाले को कम आंका जाता है। आज भी हम घर में बच्चे से कहते हैं: में - "बेटा हिंदी में मत सोचो, अंग्रेजी में सोचो।" यह मानसिक गुलामी है। अंग्रेज चले गए, पर अंग्रेजी का रौब छोड़ गए।
हिंदी दिवस पर हमें दो बातें समझनी होंगी।
पहली, हिंदी विरोधी नहीं, समावेशी है। हिंदी दिवस का मतलब अंग्रेजी हटाओ नहीं है। अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है, उसे सीखो। पर अपनी माँ को मत भूलो। जापान, जर्मनी, फ्रांस, चीन - कोई भी देश अपनी भाषा छोड़कर तरक्की नहीं किया। उन्होंने अपनी भाषा में विज्ञान पढ़ा, अपनी भाषा में तरक्की की। हमें भी हिंदी में डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनाना होगा। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में पढ़ाई का प्रावधान एक क्रांतिकारी कदम है।
दूसरी, हिंदी को क्लिष्ट मत बनाओ। हिंदी को संस्कृत के भारी-भरकम शब्दों से लादने की जरूरत नहीं है। आम बोलचाल की हिंदी, जिसमें उर्दू भी हो, अंग्रेजी के प्रचलित शब्द भी हों, वही जीवित रहेगी। तुलसी ने अवधी में लिखा, कबीर ने खिचड़ी भाषा में लिखा, प्रेमचंद ने हिन्दुस्तानी में लिखा। जनता ने अपनाया। आज अगर हम 'कंप्यूटर' को 'संगणक' कहकर जबरदस्ती थोपेंगे तो युवा नहीं अपनाएगा। भाषा नदी है, उसे बहने दो।
मेरा अनुभव कहता है कि हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। क्योंकि अगला भारत हिंदी का भारत है। गांव से जो बच्चा इंटरनेट पर आ रहा है, वो गूगल से हिंदी में पूछता है - "पेट दर्द का इलाज क्या है?" वो अंग्रेजी नहीं जानता, पर वो भारत का है।
हिंदी दिवस एक दिन का उत्सव नहीं है, यह प्रतिज्ञा का दिन है। प्रतिज्ञा करो कि आज से एक काम हिंदी में करोगे। हस्ताक्षर हिंदी में करोगे, अपने दुकान का बोर्ड हिंदी में लिखोगे, अपने बच्चों को एक हिंदी कहानी रोज सुनाओगे।
हिंदी तभी बचेगी जब वह नौकरी में, बाजार में और पर्व में दिखेगी। आइए, इस हिंदी दिवस पर हिंदी को सिर्फ माला न पहनाएं, उसे काम में लाएं।
-सुखमंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश,भारत
Sukhmangal Singh
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