''हिंदी - हमारी पहचान, हमारा स्वाभिमान"
हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, माथे की बिंदी है,
इसी से तो हिंदुस्तान की पहचान जिंदी है।
माँ के लोरी में, पिता के दुलार में है,
गीता के श्लोक में, कुरान के सार में है।
तुलसी के राम में, सूर के श्याम में है,
वतन के तराने में, शहीदों के नाम में है।
अंग्रेजी ज्ञान है, पर हिंदी सम्मान है,
अंग्रेजी से नौकरी, हिंदी से पहचान है।
जब तक हिंदी बोली जाएगी, भारत मुस्कुराएगा,
हर शब्द में इसका तिरंगा लहराएगा।
इसे बोलने में कैसी शर्म, कैसा संकोच?
ये तो गंगा की धारा है, सबसे पावन सोच।
हिंदी टूटी तो देश की रीढ़ टूटेगी,
हिंदी रूठी तो माँ की बोली रूठेगी।
आओ संकल्प लें, हिंदी को अपनाएंगे,
घर-घर, गली-गली इसका अलख जगाएंगे।
बच्चों को सिखाएंगे, हिंदी गर्व से बोलो,
दुनिया को बता दो, हम हिंदी वाले हैं, बोलो।
यही हमारी जड़ है, यही हमारा मान है,
हिंदी है तो हम हैं, हिंदी हिंदुस्तान है।।
- डॉ सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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