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"हथिया की पुरवाई और मछली वाला आँगन"

 
हथिया नक्षत्र और पुरवाई की बात से मन गाँव की तरफ चला गया। 
 "संस्मरण"
"हथिया की पुरवाई और मछली वाला आँगन"  
-लेखक: सुखमंगल सिंह

बात 1965 के आसपास की है। मैं तब 8-9 साल का रहा होऊँगा। तत्कालीन फैजाबाद जनपद वर्तमान अंबेडकर नगर के गाँव में पितृपक्ष लगा था। 

घाघ जी की कहावत गाँव के बुजुर्ग रोज दोहराते - "हथिया पुरवाई पावै, लौट चौमास लगावै"  
और सचमुच उस साल हथिया नक्षत्र में पुरवाई ने साथ दे दिया। 2 दिन से रुक रुक कर बदरा झूम झूम के बरस रहे थे।

पितृपक्ष का समय था। कहावत थी "बोली लुखरी फूला कास, अब छोड़ो वर्षा की आस"। लोमड़ी शाम को बोलती और कास के फूल सफेद हो जाते। लोग मानते थे अब बारिश नहीं होगी। पर उस साल हथिया ने सब गणित बदल दिया।

दादा जी एक महीना पहले से तैयारी कर लेते थे। साँवा कोदो धान के चावल रागी मकई जौ का आटा मसूर अरहर मटर चना की दाल सब कोठे में भर देते। कहते "बेटा हथिया में 15 दिन तक सूरज नहीं निकलेगा"। और होता भी वही था।

तीसरे दिन पानी इतना बरसा कि हमारे आँगन में 2-3 इंच पानी भर गया। सुबह उठे तो देखा आँगन में 4-5 छोटी छोटी मछलियाँ तैर रही थीं। नाली के रास्ते तालाब से आ गई होंगी।

बस फिर क्या था। हम 5-6 बच्चे चीखते हुए दौड़े। कोई गिरा कोई संभला। जिसके हाथ मछली लगी वो सबसे बड़ा सिकंदर। लकड़ी के कठौते में पानी भरकर मछली रखी। साँवा का कन चुगाया। पूरा दिन उसी के पास बैठे रहे।

स्कूल 12 दिन बंद रहा। कीचड़ सड़क सब डूब गई थी। शाम को अम्मा मटर की मकुनी बनातीं। ऊपर से देशी घी और गुड़ डालकर गरम गरम परोसतीं। आग की अँगीठी के पास बैठकर खाने का आनंद आज भी जीभ पर है।

गाँव के किसान खुश थे। कहते थे "हथिया की बरसात रबी को सोना कर देगी"। और हुई भी। उस साल धान और बाजरा की फसल लहराई थी।

आज 60 साल बाद भी जब सितंबर में हथिया आता है और पुरवाई बहती है तो मन उसी आँगन में चला जाता है। अब आँगन पक्के हो गए हैं। मछलियाँ नहीं आतीं। स्कूल बंद नहीं होते। पर दादा जी की वो बात आज भी याद है - "प्रकृति का हिसाब और किसान की उम्मीद कभी गलत नहीं होती"

जलवायु बदल गई है पर हथिया नक्षत्र आज भी किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनकर आता है।

- लेखक सुख मंगल सिंह 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
वाराणसी 

 इसमें "लोक जीवन प्रकृति और किसान" तीनों का रंग है।




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