हमारी बात यहाँ कौन सुनने वाला है,
अंधेरों में दिया कौन जलने वाला है।
उजाला बाँट रहा है वो गली-गली लेकिन,
खुद अंधेरे में ही तो ढलने वाला है।
फकीरों से न पूछो घर का हवाला कभी,
उनका तो हर ठिकाना निराला वाला है।
जो आज रूठ के बैठा है बज़्म से अपनी,
वो कल इसी को फिर से सजाने वाला है।
सुख मंगल की ग़ज़ल को सुनो तो जानोगे,
हर लफ्ज़ दर्द का इक आइना वाला है।।
-सुखमंगल सिंह
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY