Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"ज्ञान की भूख"*

 
*गीत: "ज्ञान की भूख"*  

पेट की भूख तो रोटी से बुझ जाती है,  
पर ज्ञान की भूख हर पल बढ़ती जाती है।  

एक दीप जले तो सौ दीपक माँगे,  
एक प्रश्न सुलझे तो सौ प्रश्न जागे।  

ग्रंथों के सागर में जितना डुबकी लगाए,  
प्यास और गहरी, मन और अकुलाए।  

ऋषियों ने वन में जो तप कर पाया,  
कण-कण में ब्रह्म का रहस्य समाया।  

न उम्र की सीमा, न कोई दीवार,  
ज्ञान का आँगन है सबसे उदार।  

शिक्षक की छड़ी से नहीं डरे जो,  
पुस्तक की गंध से ही सँवरे वो।  

सुकरात ने विष पीकर भी कहा,  
"मैं कुछ नहीं जानता", यही ज्ञान रहा।  

अँधेरे में सूरज को ढूँढे जो आँख,  
अज्ञान की रात को चीर दे वो झाँख।  

डिग्री के कागज से तृप्त न हो मन,  
जीवन-पाठशाला में सीखे हर क्षण।  

ज्ञान की भूख ही मनुष्य बनाती,  
पशु से अलग, उसे देव बनाती।  

यह भूख लगे तो समझो वरदान,  
बुझती नहीं, देती नित नूतन ज्ञान॥

- डॉ सुखमंगल सिंह/वाराणसी जनपद ।



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