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Dr. Srimati Tara Singh
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" ज्ञान की बातें"

 

" ज्ञान की बातें" 


गीता, वेद और शास्त्रों के अनुसार "क्या अच्छा है और क्या बुरा है" 

सनातन धर्म में अच्छा-बुरा कर्म, सोच और इरादे से तय होता है, न कि सिर्फ करने से। 

1. क्या अच्छा है - 
"धर्म"
गीता और वेदों में इसे *धर्म* कहा गया है।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं - अध्याय 2, श्लोक 31  
"स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि"  
अपने धर्म/कर्तव्य का पालन करना सबसे अच्छा है। डरना नहीं चाहिए।_

अच्छे कर्म:
सत्य बोलना -
 "सत्यं वद, धर्मं चर" - वेद
दया और करुणा -
 सब जीवों पर दया करना 
कर्तव्य निभाना -
 माता-पिता, गुरु, समाज के प्रति जिम्मेदारी
क्षमा, संतोष, संयम - 
क्रोध और लालच पर काबू
निष्काम कर्म- 
फल की इच्छा किए बिना कर्म करना -गीता अध्याय 2 श्लोक 47

ज्ञान और भक्ति - 
ईश्वर को याद रखना

2. क्या खराब है -
 "अधर्म"
गीता अध्याय 16 में इसे "आसुरी संपदा"  कहा गया है।

खराब/त्याज्य कर्म:

क्रोध, घमंड, पाखंड - 
गीता 16.4
झूठ, चोरी, हिंसा -
 बिना कारण किसी को दुख देना
लालच, मोह, नशा- 
इंद्रियों का गुलाम बनना
कर्तव्य से भागना -
 जैसे अर्जुन युद्ध से भागना चाहता था !
निंदा और अपमान -
 बड़ों का, गुरु का अनादर
अहंकार - 
"मैं ही सब कुछ हूँ" ये भाव

"गीता 3.35"
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्"  
अपना छोटा धर्म भी अच्छा है, दूसरों का बड़ा धर्म नकल करके करने से बेहतर नहीं।

3. वेद और शास्त्र का सार - 4 बातें:
अच्छा  -    बुरा
धर्म- 
सत्य, दया, कर्तव्य    
अधर्म- 
झूठ, हिंसा, स्वार्थ
ज्ञान - 
सीखना, समझना    
अज्ञान- 
जिद, अंधविश्वास
तप- 
संयम, मेहनत    
भोग - 
सिर्फ सुख के पीछे भागना
सेवा - 
दूसरों की मदद    
शोषण - 
अपना फायदा दूसरों के नुकसान से

सबसे बड़ी सीख गीता से:
"कर्म करो, फल की चिंता मत करो"  
अच्छा वो है जो निस्वार्थ भाव से, धर्म के साथ किया जाए।  
बुरा वो है जो स्वार्थ, अहंकार और दूसरों को दुख देकर किया जाए।

और एक बात -
 गलती सब से होती है। खराब कर्म करने के बाद पछतावा + सुधार = वो भी अच्छा बन जाता है। जैसे कहानी वाले बंटी ने किया।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 
Sukhmangal Singh

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