"गांव की मर्यादा - भाग -2: बंटी का नया सफर"
पंचायत के फैसले के बाद बंटी वाकई बदल गया।
सुबह 5 बजे उठकर मंदिर की सीढ़ियां झाड़ता, स्कूल का आंगन बुहारता। गांव वाले पहले तमाशा देखते थे, फिर धीरे-धीरे सिर हिलाकर शाबाशी देने लगे।
लेकिन घर के अंदर माहौल अब भी ठंडा था।
"चाचा हरदयाल" के घर के लोग बंटी से बोलना बंद कर चुके थे।
कारण साफ था।
पहले जब बंटी के पिता "रघुवीर" जिंदा हैं, तब भी यही चलन है।
"हरदयाल, गाड़ी यहां ले चलो... गाड़ी वहां ले चलो"
पेट्रोल-डीजल का एक रुपया नहीं देंगे, पर दिनभर हरदयाल से टहलवाते।
और अगर कभी हरदयाल थक कर "भाई आज नहीं जा पाऊंगा" कह देते, तो रघुवीर का परिवार मुंह बना लेता, 3 दिन तक खाना तक साथ नहीं खाता।
वही आदत अब बंटी के घर वालों में भी थी।
बंटी सुधर गया था, पर घर की औरतें और रघुवीर के नाम पर जीने वाले लोग अब भी हरदयाल से कटा-कटा व्यवहार करते।
एक दिन खेत में पानी नहीं था। हरदयाल अकेले मोटर चलाकर थक गए।
शाम को बंटी आया और बोला — "चाचा, मोटर में तेल डलवा दूं? कल से मैं भी सिंचाई करूंगा।"
हरदयाल की आंखें भर आईं। 20 साल बाद किसी ने "मैं भी" कहा था।
उन्होंने कहा — "रहने दे बेटा, तू अपना काम कर।"
बंटी ने जिद की। अगले दिन 500 का तेल डलवाया, पाइप बिछाया और दोनों ने साथ में खेत सींचा।
रात को खाने की थाली में बंटी ने खुद हरदयाल के लिए रोटी परोसी।
घर की महिलाएं देखती रहीं। कोई कुछ नहीं बोला।
मोनू बीच में बोला — "दादी, पापा अब गाली नहीं देते। चाचा के साथ काम भी करते हैं। फिर हम बात क्यों नहीं करते?"
दादी चुप। जवाब नहीं था।
15 दिन की सफाई पूरी होने पर सरपंच ने फिर पंचायत बुलाई।
सरपंच ने कहा — "बंटी ने सजा पूरी की। अब फैसला तुम्हारा है घर वालों। माफी देना है या नफरत पालनी है।"
उस दिन दादाजी सुखराम फिर खड़े हुए।
"देखो, तेल और गाड़ी का हिसाब भगवान भी रखता है। हरदयाल ने 20 साल टहल बजाई, एक बार उफ तक नहीं किया।
आज बंटी बदल गया है। अगर हम अब भी मुंह फुलाएंगे, तो हम खुद अपने घर की दीवार गिराएंगे।"
उसी शाम चाची ने बंटी के लिए गरम रोटी बनाई। पहली बार 6 महीने बाद एक थाली में खाना लगा।
बंटी ने सिर झुकाकर कहा — "चाचा, जो तेल के पैसे लगे थे, वो मैं हर महीने दूंगा। और गाड़ी... गाड़ी अब दोनों की है। जब जरूरत हो ले जाना।"
हरदयाल हंस दिए — "बेटा, गाड़ी नहीं, रिश्ते चलने चाहिए।"
"6 महीने बाद"
उसी मोटर पंप के पास बोर्ड लगा — "हरदयाल & बंटी एग्रीकल्चर"
गांव में अब उदाहरण दिया जाता — "बंटी जैसा बिगड़ा भी सुधर गया, तो तुम क्यों नहीं?"
सीख: -
1. *बदलाव को समय दो*। माफी मांगना आसान है, माफी देना हिम्मत मांगता है।
2. *पुराने हिसाब* रिश्तों में जहर घोलते हैं। आगे बढ़ना है तो पुराना बहीखाता बंद करो।
3. *एक व्यक्ति सुधर जाए* तो पूरा घर बच सकता है।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश
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