गंगा उदगम से समुद्र तक
गंगा मैया की लहरें, पावन और निर्मल,
उदगम स्थल से, बहती है अविरल।
गोमुख से निकलती, हिमालय की गोद से,
पवित्र जलधारा, बहती है मंद गति से।
ऋषिकेश की घाटी में, गंगा का रूप है न्यारा,
हर-हर गंगे, गूंजता है मां का जयकारा।
प्रयाग की त्रिवेणी में, संगम का है मेला,
गंगा-यमुना-सरस्वती, का पावन खेला।
काशी की गलियों में, गंगा का है किनारा,
मणिकर्णिका घाट पर, जलता है चिता का सारा।
गंगा मैया की महिमा, अपरंपार है,
भक्तों की आस्था का यह एक केंद्र है।
गंगा की लहरें, नाचती हैं मस्ती में,
भक्तों के दिलों में, बसती हैं हस्ती में।
गंगा का जल, पापों को धोता है,
मोक्ष की राह, दिखाता है।
गंगा की महिमा, अनंत है,
भक्तों की आस्था, का प्रतीक है।
गंगा मैया की जय, हर-हर गंगे,
समुद्र तट तक, बहती है पावन गंगे।
गंगा का जल, समुद्र में मिलता है,
एकाकार हो जाता है, अपनी मंजिल पाता है।
गंगा मैया की महिमा, अजर अमर है,
भक्तों के दिलों में, गंगा बसती है।।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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