*गंगा दशहरा*
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को स्वर्ग से धरा उतरी धार
भागीरथ की तपस्या का मिला अनुपम उपहार।
शिव-जटा से छूटी तो मच गया जय-जयकार
दस पाप हरने आई माँ, लेकर अमृत की फुहार ।
हर हर गंगे! नाद से गूँज उठे घाट-घाट
दशाश्वमेध पर दीपों की झिलमिलाती बारात ।
साधु-संत, नर-नारी सब डुबकी लगाएँ साथ
धोएँ जन्मों के कलुष, पाएँ पुण्य की सौगात ।
गंगा माँ की हर लहर में वेद-ऋचाएँ गाती हैं
पाप-ताप की जंजीरें पल भर में कट जाती हैं ।
जो एक बार नहा ले, वह फिर कभी न मरता है
मोक्ष-द्वार तक उसको गंगा ही लेकर चलता है ।
दश प्रकार के पाप कटें, दश इन्द्रियाँ सुधर जाएँ
काम-क्रोध-मद-लोभ का मैल सदा को धुल जाए ।
भागीरथ के पुण्य से हम तक यह धारा आई
आज दशहरा पर इसकी महिमा जग ने गाई ।
आओ मिलकर संकल्प लें, निर्मल रखें इसकी धार
प्लास्टिक-कचरा न बहाएँ, दें माँ को यह उपहार ।
गंगा केवल नदी नहीं, भारत की संस्कृति-प्राण
इसके कण-कण में बसते हैं कोटि-कोटि भगवान।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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