Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

"गुड़ का लड्डू और पेट्रोल"

 
  "गुड़ का लड्डू और पेट्रोल" 

बात उन दिनों की है जब "कवि लथेरन जी"  ने पूरे माह भर की मेहनत से लहुरी काशी यानी "गाजीपुर के लंका क्षेत्र"  में एक विस्तृत हाल बुक किया था। हाल किसी तरह जुगाड़ से मिला था, और उम्मीद बड़ी थी।

कार्यक्रम के तीन दिन पहले लथेरन जी ने अपने सीधे-साधे कवि मित्र "योगेंद्र नाथ जी" से आग्रह किया: -  
"भाई, चार कवियों और एक कवयित्री को गाड़ी में बिठाकर ले आना। आने-जाने का तेल मैं भरवा दूंगा।"

योगेंद्र नाथ जी भरोसा करके मान गए। उन्होंने "कवि रमेश चन्द्र द्विवेदी जी, कवि सुरेश पाण्डेय जी, कवि विनोद तिवारी जी, कवि अशोक मिश्र जी"  और "कवयित्री श्रीमती गीता वर्मा जी"  को गाड़ी में बैठाया और गाजीपुर ले गए।

कार्यक्रम हुआ। मंच सजा। कविताएं भी खूब हुईं।  
पर जब वापसी की बारी आई तो तेल के पैसे तो दूर, एक रुपया भी नहीं दिया गया।

भूखे पेट कवि क्या करें? सुबह से कुछ नहीं खाया था।  
आयोजनकर्ता की तरफ से मिला - "एक छोटा गुड़ का लड्डू और एक रेडीमेड समोसा" । बस।  
न आयोजक कवि ने पूछा, न हाल मालिक ने पानी तक दिया।

कवियों की हालत आप जानते ही हैं सर। उन्हें कार्यक्रम में " "100-50 रुपये का लिफाफा" मिला था, पर वो भी गाड़ी वाले भैया के हवाले नहीं किया बल्कि लोग  सिगरेट ते और पान में खर्च कर दिये।
आखिर में गाड़ी मालिक ने ही रहम खाई। उसने न सिर्फ पेट्रोल भरवाया, बल्कि रास्ते में सबको नाश्ता भी करवाया।

उस दिन समझ आया कि " कविता से पेट नहीं भरता, पर कवि का दिल बड़ा होता है"!  
और ये भी कि सच्चा सम्मान मंच पर नहीं, रास्ते में नाश्ता कराने वाले में होता है।

- कवि सुख मंगल सिंह 
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 

कैसा लगा सर ये संस्मरण? 



Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ