डॉक्टर तरा सिंह: स्मृति शेष" प्रसंग
स्रोत: DR. TARA SINGH SPECIAL EDITION, , खंड स्वर्ग विभा'
"प्रस्तुति और उद्देश्य"
स्वर्ग विभा' पत्रिका की संस्थापिका-संपादिका डॉ. तारा सिंह के गोलोक गमन पर यह "स्मृति शेष" स्तंभ उनके जीवन, कृतित्व और प्रभाव का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। शीर्षक "एक उज्ज्वल दीप बुझा" ही पूरे पृष्ठ का मर्म कह देता है।
"विषयवस्तु विश्लेषण"
1. संपादकीय टिप्पणी:
पहला खंड डॉ. तारा सिंह को "सृजन, संस्कार और समर्पण की अद्भुत त्रिवेणी" कहता है। उन्हें सुविख्यात विदुषी, प्रखर रचनाकार और समाजसेवी बताया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात — 'स्वर्ग विभा' पत्रिका के माध्यम से उन्होंने न केवल देश बल्कि विदेशों में भी हिंदी प्रेमियों को जोड़ा। यह उनके कृतित्व का वैश्विक आयाम दर्शाता है। उनका मुंबई में निधन "साहित्य जगत के लिए असहनीय क्षति" कहा गया है और पृष्ठ पर छपी रचनाओं को देखकर यह कथन अतिशयोक्ति नहीं लगता।
2. सत्येन्द्र कुमार पाठक का वक्तव्य:
बिहार के साहित्यकार एवं इतिहासकार का यह कथन सबसे भारी है: "डॉ. तारा सिंह का जाना हिंदी साहित्य के एक जीवित इतिहास का अंत है।" वे रेखांकित करते हैं कि डॉ. सिंह ने समकालीन समाज के उन पक्षों को दर्ज किया "जिन्हें अक्सर मुख्यधारा का साहित्य छोड़ देता था"। उनकी लेखनी में "शोधपरक गहराई और सत्य को कहने का अदम्य साहस" था। उन्हें "कालजयी रचनाकार" कहना और यह मानना कि "भविष्य का इतिहास उनका मूल्यांकन और भी गौरव के साथ करेगा" यह एक साहित्यकार को दी जाने वाली सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
3. डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव का वक्तव्य:
स्वर्णिम कला केंद्र, मुजफ्फरपुर की अध्यक्षा उन्हें "बरगद की छाँव" कहती हैं। यह बिंब बहुत सटीक है डॉ. तारा सिंह नई लेखिकाओं के लिए संरक्षण, प्रेरणा और मार्गदर्शन थीं। "उनका जाना नारी लेखन के एक सशक्त स्तंभ का ढह जाना है" यह पंक्ति बताती है कि उनका कार्य सिर्फ रचना तक सीमित नहीं था, वे एक संस्था थीं। मुजफ्फरपुर से उनका आत्मीय जुड़ाव और "साहित्यिक ऊर्जा का संचार" यह सिद्ध करता है कि वे जड़ों से जुड़ी थीं।
शैली और प्रभाव:
पूरे पृष्ठ की भाषा शोकपूर्ण पर ओजस्वी है। कहीं विलाप नहीं, बल्कि गौरव गान है। व्यक्ति-चित्रण में अति रंजना नहीं, ठोस उपलब्धियों का उल्लेख है: पत्रिका का संपादन, समाज सेवा, नारी लेखन को दिशा, समकालीन यथार्थ का दस्तावेजीकरण।
चित्र के साथ लेखिका का सौम्य, विदुषी व्यक्तित्व उभरता है। बॉर्डर और सज्जा पत्रिका के नाम 'स्वर्ग विभा' के अनुरूप गरिमामय है।
सबल पक्ष
1. बहुआयामी मूल्यांकन: एक ही पृष्ठ पर संपादक, इतिहासकार और कला-संस्था प्रमुख के विचार डॉ. सिंह के साहित्यिक, सामाजिक और संस्थागत योगदान को समेटते हैं।
2. प्रामाणिकता: बड़े-बड़े विशेषण नहीं, बल्कि "शोधपरक गहराई", "मुख्यधारा से छूटे पक्ष", "नारी लेखन का स्तंभ" जैसे ठोस बिंदु दिए गए हैं।
3. प्रेरणा: यह पृष्ठ पाठक को शोक में डुबाता नहीं, बल्कि डॉ. तारा सिंह के अधूरे काम को आगे बढ़ाने का संकल्प देता है।
निष्कर्ष-
यह "स्मृति शेष" केवल श्रद्धांजलि नहीं, एक *साहित्यिक वसीयतनामा* है। यह बताता है कि डॉ. तारा सिंह क्यों याद की जाएँगी — इसलिए नहीं कि वे चली गईं, बल्कि इसलिए कि वे अपने पीछे 'स्वर्ग विभा' जैसी पत्रिका, 'बेटी' जैसी कहानी, 'राष्ट्र गीत' जैसी रचना और सैकड़ों प्रेरित कलम छोड़ गईं।
"स्मृति शेष" श्रद्धांजलि खंड,
संदर्भ और उद्देश्य
पृष्ठ 27 की निरंतरता में यह पृष्ठ भी डॉ. तारा सिंह को समर्पित "स्मृति शेष" स्तंभ का हिस्सा है। यदि पिछला पृष्ठ उनका 'परिचय और अवसान' था, तो यह पृष्ठ उनका "प्रभाव और विरासत" है। हरियाणा, बिहार और शिक्षा जगत से आए तीन वक्तव्य डॉ. सिंह के अखिल भारतीय व्यक्तित्व को रेखांकित करते हैं।
वक्तव्यों का विश्लेषण:
1. डॉ. त्रिलोक चंद, हरियाणा:
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हरियाणा के लेखक डॉ. सिंह को "क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर" बताते हैं। एक संपादक के रूप में उन्होंने हरियाणा के लेखकों को 'स्वर्ग विभा' के माध्यम से "राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाई"। यह वक्तव्य डॉ. तारा सिंह की *सेतु-भूमिका* को उजागर करता है — वे प्रादेशिक प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच देने वाली संपादक थीं। उन्हें "अनुशासनप्रिय और वात्सल्यमयी संरक्षक" कहना बताता है कि वे कठोर भी थीं और ममतामयी भी जो एक आदर्श संपादक का गुण।
2. आशा रघु देव, पटना, बिहार:
आशा जी ने डॉ. सिंह के साहित्यिक अवदान को सबसे सटीक शब्दों में बाँधा है। "प्रेम, घृणा, वात्सल्य, वीरता, शौर्य, संवेदनशीलता, सभी भावों, रसों का सुन्दर चित्रण" यह पंक्ति बताती है कि डॉ. तारा सिंह एकांगी रचनाकार नहीं थीं। उनका कैनवास पूरा था। "विशिष्ट राष्ट्रीय सम्मान पाकर अभिभूत हूँ" से स्पष्ट है कि यह विशेषांक उनके सम्मान के बाद का है, उनकी विरासत का उत्सव है।
3. अनिता देवी, शिक्षिका, बिहार:
यह सबसे भावुक और दूरदर्शी टिप्पणी है। एक शिक्षिका के नज़रिए से वे कहती हैं कि " यह सम्मान केवल व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, मूल्यों, संस्कारों और सेवा भाव की जीत है"। यह डॉ. तारा सिंह को व्यक्ति से 'विचारधारा' बना देता है। "सच्ची साधना पद या प्रतिष्ठा में नहीं, निरंतर सेवा, समर्पण और सत्यनिष्ठा में होती है" यह वाक्य हर युवा साहित्यकार के कमरे में टाँगने लायक है। शिक्षा को "वह दीप जो पीढ़ियों को प्रकाश देता है" कहना और डॉ. सिंह को उससे जोड़ना बताता है कि उनका कार्य साहित्य से आगे जाकर राष्ट्र-निर्माण तक फैला था।
*सामूहिक प्रभाव*
तीनों वक्तव्य मिलकर डॉ. तारा सिंह का त्रि-आयामी चित्र बनाते हैं:
1. संपादक: जो क्षेत्रीय से राष्ट्रीय तक ले गईं।
2. रचनाकार: जो नौ रसों की सिद्धहस्त थीं।
3. शिक्षक/संरक्षक: जिन्होंने मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाया।
हरियाणा से बिहार तक के स्वर यह सिद्ध करते हैं कि उनका कार्य किसी एक प्रांत तक सीमित नहीं था। "विशिष्ट राष्ट्रीय सम्मान का उल्लेख बताता है कि उनका कद जीवनपर्यंत और उसके बाद भी बढ़ता गया।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
Sukhmangal Singh
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