" दिल तो बच्चा है जी"
रामेश्वर काका 70 साल के थे। रिटायर्ड हेडमास्टर। गाँव में सब उन्हें बाबूजी कहता था। सफेद कुर्ता, चश्मा, हाथ में लाठी नहीं, एक पुरानी साइकिल। अनुशासन के पक्के।
पिछले महीने उनका पोता आरव शहर से गाँव आया। 7 साल का। बोला - "बाबूजी, आपके गाँव में झूला क्यों नहीं है?"
बस, काका के दिल में बात अटक गई।
अगले दिन काका साइकिल से बाजार गए और आम के पेड़ के लिए एक मोटा रस्सा ले आये। बूढ़ा बरगद के नीचे झूला बांध दिया।
पहले आरव झूला, फिर पड़ोस के बच्चे, फिर तो पूरा झुंड आ गया। काका देखते और मुस्कुराते।
दूसरे दिन काका खुद झूले पर बैठ गए। धोती संभालते हुए, धीरे-धीरे पैर हिलाते हुए। बच्चे हँसने लगे - "बाबूजी भी बच्चे बन गए!"
काकी ने देखा तो डाँटा - "बुढ़ापे में क्या बचपना है? लोग क्या कहेंगे? गिर-विर गए तो?"
काका बोले - "अरे दिल तो बच्चा है जी, उम्र से क्या होता है?"
बात फैल गई। कुछ लोगों ने कहा हेडमास्टर सठिया गया है।
तीसरे दिन काका ने एक और काम किया। पुरानी स्लेट निकाली, खड़िया मिट्टी ली और बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर लट्टू-कंचा खेलने लगे।
आरव ने पूछा - "बाबूजी, आपको कंचा खेलना आता है?"
काका हँसे - "बेटा, हम इसी में चैंपियन थे। तुम्हारे पापा को भी हमने ही हराया था।"
उस दिन काका 2 रुपये के कंचे जीते। जेब में डालकर ऐसे खुश हुए जैसे कोई खजाना मिल गया हो।
शाम को काका ने कंचे से टॉफी खरीदी और सब बच्चों में बाँट दी।
उसी रात काकी ने देखा, काका दर्पण के सामने खड़े अपने सफेद बालों पर हाथ फेर रहे हैं और गुनगुना रहे हैं - "दिल तो बच्चा है जी..."
काकी समझ गई। सालों से जो आदमी टाइम-टेबल, रिजल्ट, अनुशासन में बंधा रहा, रिटायरमेंट के बाद एकदम खाली हो गया था। सुबह शाम टहलना, दवा खाना, बस। अंदर का बच्चा तो कब का सहम गया था।
अब जब आरव आया तो वो बच्चा फिर जाग गया।
अगले दिन रविवार था। काका ने ऐलान कर दिया - "आज पतंग उड़ाएंगे।"
बच्चे खुश। काका बाजार से 10 पतंग, मांझा ले आये। छत पर चढ़ गए। 68 साल की उम्र में छत पर दौड़ रहे हैं - "वो काटा! वो काटा!"
एक पतंग कटी, काका उछल पड़े। चश्मा गिर गया। सब हँस पड़े, काका भी।
नीचे गाँव के प्रधान जी देख रहे थे। बोले - "रामेश्वर जी, ये क्या कर रहे हैं? आपकी इज्जत..."
काका ने छत से ही जवाब दिया - "प्रधान जी, इज्जत इसी में है कि दिल जिंदा रहे। जिस दिन दिल बूढ़ा हो गया, आदमी मर जाता है। मैं तो अभी जी रहा हूँ।"
उस दिन के बाद गाँव में एक नया नियम बन गया। शाम को बरगद के नीचे बच्चों की पाठशाला नहीं, मस्ती पाठशाला लगती। काका अध्यक्ष। कभी कहानी, कभी झूला, कभी कंचा।
बड़े-बूढ़े पहले हँसते थे, अब धीरे-धीरे आकर बैठने लगे। कोई कहता - "हमें भी बचपन याद आ गया।"
काका ने एक दिन कहा - "हम सब दिल से बच्चे ही तो हैं। बस दुनिया ने हमें जबरदस्ती बड़ा बना दिया है। जिम्मेदारियों ने, नौकरियों ने। कभी-कभी तो बच्चे बन जाना चाहिए, मन हल्का हो जाता है।"
आरव जब शहर लौटा तो बोला - "बाबूजी, मैं बड़ा होकर भी आपके जैसा बच्चा ही रहूँगा।"
काका ने उसे गले लगा लिया। आँखों में आँसू थे, पर दिल में फिर वही झूला झूल रहा था।
स्वरचित एवं मौलिक कहानी
रचनाकार - सुख मंगल सिंह
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