देवभूमि
देवभूमि का ओजहिम शिखरों से टकराकर बादल भी गरजते हैं,
गंगा की हर लहर में ऋषियों के मंत्र धड़कते हैं|
केदार की घंटी बजते ही पत्थर भी पुलक उठते हैं,
बद्री के द्वार पर आकर काल भी झुकते हैं |
यह धरती नहीं, देवताओं की सांसों का घर है,
यहाँ की हवा में तप, यहाँ की मिट्टी में स्वर है|
बर्फ पिघले तो मोक्ष बहता है इन नदियों में
चीड़ चीखते हैं जब तूफान उतरता है कंधों में,
पर्वत पुकारते हैं, उठ रे माटी के लाल,
तेरे पुरखों ने यहीं लिखा था अमर उजाल |
डर किस बात पे जब भोलेनाथ का त्रिशूल साथ है,,
जब माँ नंदा की चुनरी हर घाटी पर तनात है |
तू थक गया तो पत्थर भी तुझे धिक्कारेंगे,
तू डगमगाया तो देवदार भी ललकारेंगे |
सीना तान चल पथ पर, जहाँ ऋषि तपते थे,
यही वो भूमि है जहाँ देवता उतरते थे |
देवभूमि का कण कण गर्जना बनकर बोलता है,
जो यहाँ जन्मा, वो मृत्यु से भी नहीं डरता है ||
सुख मंगल सिंह ,
वरिष्ठ साहित्यकार ,वाराणसी
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