देश और परिवार
कहानी
गाँव का नाम था बेलहा। सरयू के किनारे बसा छोटा सा गाँव। यहाँ के लोग सीधे सरल और मेहनती थे। इसी गाँव में रहते थे मास्टर रामप्रसाद जी। उम्र 60 के पार। सफेद कुर्ता धोती पहनते थे। गाँव के स्कूल में 30 साल तक हिंदी पढ़ाई।
उनका परिवार बड़ा था। पत्नी सावित्री देवी घर संभालतीं। दो बेटे और एक बेटी। बड़ा बेटा अजय फौज में था। छोटा बेटा विजय खेती करता। बेटी राधा की शादी शहर में हो गई थी।
मास्टर साहब का एक ही सिद्धांत था - "पहले देश फिर परिवार फिर खुद"। गाँव के बच्चे उन्हें दादा जी कहते थे।
1. देश की नींव में परिवार
सुबह 5 बजे मास्टर साहब उठते। आँगन में तुलसी के पास दीप जलाते। साथ में तिरंगे को नमन करते। सावित्री देवी चाय बनातीं और कहतीं "आज स्कूल में क्या नया पढ़ाओगे"
मास्टर साहब हँसकर कहते "आज बच्चों को बताऊँगा कि परिवार से ही देश बनता है। जिस घर में माँ बाप का सम्मान होता है उसी घर से अच्छे नागरिक निकलते हैं"
स्कूल में 80 बच्चे थे। गरीब अमीर सब एक बेंच पर बैठते। मास्टर साहब रोज एक कहानी सुनाते। कभी भगत सिंह की कभी झाँसी की रानी की। बच्चे मंत्रमुग्ध होकर सुनते।
2. परीक्षा की घड़ी
2014 की सर्दी थी। खबर आई कि सीमा पर तनाव है। अजय की पोस्टिंग लद्दाख में थी। महीनों से चिट्ठी नहीं आई थी। घर में सब चिंतित थे।
उसी दिन गाँव में बाढ़ आ गई। सरयू का पानी खेतों में भर गया। विजय के 5 बीघा गेहूँ की फसल डूब गई। कर्ज का बोझ सिर पर था।
रात को बैठक हुई। सावित्री देवी रोते हुए बोलीं "बेटा जेल में है फसल गई अब क्या होगा"
मास्टर साहब ने सबका हाथ पकड़ा और बोले "घबराओ मत। देश पर संकट है तो परिवार को मजबूत रहना होगा। अजय देश बचा रहा है हम गाँव बचाएँगे"
अगले दिन से मास्टर साहब ने गाँव के नौजवानों की टोली बनाई। बाँध बाँधा राहत सामग्री बाँटी। खुद भूखे रहकर बच्चों को खाना खिलाया। 15 दिन में गाँव फिर से खड़ा हो गया।
3. भाई सीमा पर बहन घर पर
राधा शहर से आई। साथ में 2 महीने का बेटा था। पति की नौकरी चली गई थी। वो भी टूट गई थी।
रात को राधा ने कहा "भैया की खबर नहीं है घर की हालत खराब है"
मास्टर साहब ने पोते को गोद में लिया और कहा "बेटा देख परिवार ऐसे ही चलता है। जब एक गिरता है दूसरा हाथ देता है। तेरा भाई देश के लिए लड़ेगा और हम यहाँ देश के लिए गाँव के लिए लड़ेंगे"
राधा ने अगले दिन से गाँव की महिलाओं को सिलाई कढ़ाई सिखानी शुरू की। 6 महीने में 20 महिलाएँ स्वावलंबी हो गईं।
4. दादा दादी का संस्कार
स्कूल बंद था तो बच्चे घर आते। दादा गीता का एक श्लोक सुनाते "कर्मण्येवाधिकारस्ते"। समझाते "बेटा फल की चिंता मत करो काम करो"
दादी चरखा चलाते हुए लोकगीत गाती "देशभक्ति की ज्वाला मन में भर जाए"
बच्चे सीखते कि देशभक्ति भाषण से नहीं सेवा से होती है।
5. अजय की वापसी
6 महीने बाद डाकिया चिट्ठी लाया। अजय घायल हुआ था पर अब ठीक था। 2 महीने की छुट्टी लेकर आया।
गाँव वालों ने स्वागत किया। अजय ने देखा कि उसके पीछे उसका परिवार और पूरा गाँव खड़ा था। उसने कहा "मैंने वहाँ बंदूक चलाई आपने यहाँ कलम चलाई। दोनों से देश बचा"
उस दिन पंचायत हुई। मास्टर साहब ने कहा "देखो रोटी एक थाली में बंटी तो भूख मिटी। खुशी एक आँगन में हुई तो गाँव हर्षाया। देश की तरक्की में परिवार का सहयोग लगता है और परिवार की एकता में देश का भविष्य पलता है"
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6. निष्कर्ष
2 साल बाद बेलहा गाँव आदर्श गाँव घोषित हुआ। स्कूल में कंप्यूटर आए। महिलाओं का स्व सहायता समूह बना। खेतों में नई खेती हुई।
मास्टर साहब अब 70 के हैं। रोज सुबह तिरंगे को नमन करते हैं। पोते से कहते हैं "बेटा याद रखना हे भारत माँ तेरे घर घर में दीप जलाएँगे। तेरी सेवा में तन मन धन सब काम लगाएँगे। जब तक साँस चले देश और परिवार का मान बढ़ाएँगे"
शाम को पूरा परिवार छत पर बैठता है। अजय वर्दी में विजय खेत की बात करता है राधा बच्चों को कहानी सुनाती है। सावित्री देवी सबके लिए खाना परोसती हैं।
मास्टर साहब दूर क्षितिज पर देखते हैं और धीरे से कहते हैं "यही है असली भारत। जहाँ परिवार देश है और देश परिवार"
कहानी का संदेश-
देश बड़ा तभी होता है जब परिवार मजबूत हो। और परिवार मजबूत तभी होता है जब उसमें देशभक्ति का संस्कार हो।
ये कहानी "सेवा + संस्कार + राष्ट्रप्रेम" वाले विचारों से प्रेरित है। शब्द संख्या लगभग 980 है।
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