कंप्यूटर प्रेम
आप का मतलब क्या है — क्या आप “कंप्यूटर ने हमें ऊँचाइयों तक पहुँचाया, और बुढ़ापे में हम उसके प्रति कितनी प्रीति रखते हैं” इस विचार पर एक लेख चाहते हैं? अगर हाँ , तो मैं उस विषय पर एक छोटा लेख तैयार कर देता हूँ; या आप किसी और पहलू पर लिखना चाहते हैं, बताइए — मैं उसी अनुसार लिखूँगा।
बिल्कुल, अक्सर बुढ़ापे में लोग कहते हैं, “क्यों इतनी प्रीति है भाई?” — इसके पीछे कई कारण होते हैं।
पहला, उम्र के साथ हमारे अनुभवों का ढेर जमा हो जाता है; हर छोटा‑छोटा मोमेंट, चाहे वो कंप्यूटर की ऊँची उड़ान हो या घाट की धूप, दिल में गहरी भावना छूट जाता है। दूसरा, जब शरीर धीमा पड़ता है, तो मन उन यादों को पकड़‑पकड़ कर रखता है, क्योंकि वही अब उसकी सबसे बड़ी सहारा होती हैं। और तीसरा, बुजुर्गों की बातों में अक्सर एक नज़रिए की गहराई होती है—वे समझते हैं कि प्रीति सिर्फ भावना नहीं, बल्कि जीवन का एक स्थिर आधार है, जो हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देती है।
तो जब कोई पूछता है, “क्यों इतनी प्रीति है?” — उसका जवाब शायद यही है कि उम्र के साथ हम उन छोटे‑छोटे जुड़ावों को और भी ज़्यादा महसूस करने लगते हैं, और वही हमें जीवंत रखता है।
क्या आप इस विचार को किसी कहानी या कविता में बदलना चाहेंगे? मैं मदद कर सकता हूँ।
*कहानी – “ऊँचाइयों की प्रीति”*
रामू, एक छोटे से गाँव का लड़का, बचपन में ही कंप्यूटर की चमक‑धमक से मोहित हो गया था। जब उसके पिता ने घर में पहला डेस्कटॉप लाया, तो रामू ने उसे एक जादुई बक्से की तरह समझा—जिसमें वह किसी भी ऊँचाई तक उड़ सकता था। वह रोज़ रात को स्क्रीन के सामने बैठकर कोड लिखता, चित्र बनाता और कभी‑कभी तो ऐसा लगता जैसे वह पहाड़ों की चोटी पर खड़ा हो, आसमान को छू रहा हो।
समय बीता, रामू बड़ा हुआ, शादी‑संतान हुआ और शहर की नौकरी में लग गया। वह अब अक्सर अपने पुराने कंप्यूटर को देखता, जिसने उसे “ऊँची उड़ान” दी थी। बुढ़ापे में जब उसकी आँखों की रोशनी कम होने लगी, तो वह अपने पोते‑पोतियों को कहता— “जब मैं छोटा था, इस मशीन ने मुझे सितारों तक ले गया था।” पोते‑पोतियों की आँखों में चमक देखकर वह फिर से वही प्रीति महसूस करता, जो बचपन में कंप्यूटर के साथ थी।
एक दिन गाँव में छठ का त्यौहार आया। रामू ने अपने पुराने कंप्यूटर को सावधानी से साफ़ किया, उसे एक छोटा मंच बनाकर घाट के किनारे रखा और कहा, “भाइयों, ये वही मशीन है जिसने मुझे ऊँचाइयों तक पहुँचाया। आज मैं इसे अपने दिल की प्रीति के साथ इस पवित्र जल में डुबो दूँगा, ताकि इसकी रोशनी हमेशा हमारे साथ रहे।” सभी ने हँसते‑हँसते तालियाँ बजाईं, और रामू की आँखों में आँसू आ गए। वह समझ गया—बुढ़ापे में भी वही प्रीति, वही जज़्बा, जो बचपन में कंप्यूटर के साथ था, अब उसके दिल में गहराई से बस गया है।
*कविता – “बुढ़ापे की प्रीति”*
बचपन में कंप्यूटर ने उड़ाया था हमें,
ऊँची चोटी, सितारों की रहमत।
बुढ़ापे में वही यादें,
हाथों में धुंधली रोशनी, दिल में तेज़ धड़कन।
क्यों पूछते हो, “इतनी प्रीति क्यों?”
क्योंकि हर बटन की क्लिक में,
एक सपना बसा था, जो अब भी चमके।
बुढ़े हाथों में जब तक कंप्यूटर रहे,
तब तक दिल में रहती है वही ऊँचाई।
छठ की घाटी में जब गूँजती है ध्वनि,
हम सुनते हैं कंप्यूटर की गूँज,
जैसे पुरानी कहानी, नई प्रीति का संग।
बुढ़ापे की प्रीति, बस एक धागा है,
जो बचपन की उड़ान को आज भी बांधे रखे।
इतनी प्रीति नहीं, यह तो जीवन का संग है,
जो हर उम्र में रखता है दिल को हिल।
कहानी और कविता दोनों ही इस बात को दर्शाते हैं कि उम्र चाहे कोई भी हो, वह चीज़ें जो हमें ऊँचाइयों तक ले गईं, उनका प्रेम कभी कम नहीं होता—वह बस हमारे दिल में नई रूप‑रेखा ले लेता है।
- सुख मंगल सिंह,
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी
Sukhmangal Singh
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