चिट्ठी
- डॉ सुखमंगल सिंह गाँव के डाकखाने में आज भी एक पीला लिफाफा सबसे ऊपर रखा रहता है। डाकिया रमेश जानता है, उसे बाँटना नहीं है।
तीस साल पहले सरहद से हवलदार रघु की पहली चिट्ठी आई थी। माँ ने उसे माथे से लगाया, फिर गाँव भर को सुनाया। उसके बाद हर महीने की पाँच तारीख को नीले रंग की अंतर्देशीय आती। माँ चौके से हाथ पोंछते हुए दौड़ती, चिट्ठी को आँचल से ढककर तुलसी के बिरवे के पास बैठती और घंटों पढ़ती।
फिर कारगिल की लड़ाई शुरू हुई। तीन महीने... कोई चिट्ठी नहीं। चौथे महीने डाकिया झुका सिर लेकर आया। सरकारी लिफाफा था। माँ ने कांपते हाथों से लिया, खोला नहीं। बस सीने से लगा लिया। बोली, "मेरा रघु छुट्टी पर गया है। लंबी छुट्टी पर।"
गाँव वालों ने कहा, "काकी, क्रिया-कर्म कर दो।"
माँ हँस दी, "फौजी की माँ मरे हुए बेटे का इंतजार नहीं करती, जिंदा लौटने का भरोसा करती है।"
उस दिन के बाद माँ ने खाना बनाना नहीं छोड़ा। रोज दो थाली लगाती। एक अपनी, एक रघु की। रात को उसकी चारपाई पर मच्छरदानी लगा देती। डाकिया जब भी आता, माँ दरवाजे पर खड़ी मिलती। पूछती, "रमेश बेटा, आज कोई चिट्ठी?"
रमेश सिर हिला देता। माँ फिर भी कहती, "कल आएगी।"
पिछले जाड़े में माँ बहुत थक गई। मरते समय बेटी का हाथ पकड़कर बस इतना कहा, "डाकिया आए तो कहना, रघु की माँ इंतजार कर रही थी। चिट्ठी यहीं रख देना।"
माँ गई, पर इंतजार रह गया।
अब हर महीने की पाँच तारीख को रमेश खुद एक अंतर्देशीय लिखता है। पता लिखता है: स्वर्ग, माँ के नाम। और उसमें बस एक लाइन:
"माँ, मैं ठीक हूँ। तेरी रसोई की रोटी की खुशबू अब भी याद है। तेरा रघु।"
फिर उस चिट्ठी को माँ की तस्वीर के सामने रख देता है। गाँव वाले कहते हैं, "रमेश पागल हो गया है।"
रमेश कहता है, "माँ की उम्मीद को मरने कौन देगा? जब तक एक डाकिया जिंदा है, माँ की चिट्ठी आती रहेगी।"
"क्योंकि माँ कभी इंतजार करना नहीं छोड़ती। और धरती कभी माँ होना नहीं छोड़ती।"
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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