बड़े काम की चीज है "छाता":
*छाता*
बरसात की बूँदें जब धरती पर आएँ,
छम-छम करे गगन, घटा घिर-घिर जाए ।
तब एक साथी बनकर छाता तन जाए,
सिर पर तना हुआ वह काला सा मंडप भाए।
धूप चिलचिलाती जब सर पर आग बरपाए,
छाता ही बनकर साया अपना फैलाए।
बूढ़े की लाठी, बच्चे की छड़ी बन जाए,
कंधे पर धर दो तो बोझा भी उठवाए।
स्कूल को चलें जब नन्हे कदम बढ़ाएँ,
बस्ते संग छाता भी कंधों पर लहराए।
रंग-बिरंगे फूलों सा जब वह खिल जाए,
कीचड़-पानी में भी हँसी खूब खिलखिलाए।
आँधी चले जोर से, पलटे-उलटे खाए,
फिर भी न टूटे हिम्मत, सीधा तन जाए।
टूटे हुए तार से खुद को जुड़वाए,
रिपु बनके बारिश से लड़ता-भिड़ता जाए।
कभी छड़ी बन रस्ता टटोले, राह दिखाए,
कभी बंद होकर कोने में चुप बैठ जाए।
गर्मी, जाड़ा, बरखा सब ऋतु साथ निभाए,
बिना बोले सेवा करे, कभी न कुछ चाहे।
ऐसा सखा जग में छाता ही कहलाए,
छोटा सा दिखता पर काम बड़े कर जाए।
मौलिक स्वरचित अप्रकाशित कविता
- सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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