छठ पूजा में मनसुख की ससुराल यात्रा
*छठ पूजा में मनसुख की ससुराल यात्रा: एक निबंध*
छठ का त्यौहार उत्तर भारत में, विशेषकर बिहार‑ज्योतिष में, सूर्य देव और छठी माई की पूजा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है। इस साल मनसुख को अपने ससुराल में छठ पूजा में शामिल होने का अवसर मिला। ससुराल में छठ का माहौल देख कर मनसुख के दिल में उत्साह और थोड़ा तनाव दोनों ही थे—एक ओर जहाँ वह इस पवित्र पर्व को परिवार के साथ मनाने को लेकर खुश था, वहीं दूसरी ओर बुजुर्गों को गाड़ी से घाट तक ले जाने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी।
सुबह की ठंडी हवा में मनसुख ने पहले घर की सफ़ाई, गन्ने की राली और फूलों की टोकरी तैयार की। ससुराल में माँ और दादी ने पहले ही चावल, दाल, गुड़ और फलों का प्रबंध कर रखा था। मनसुख ने गाड़ी की टायर प्रेशर, इंजन ऑइल और ईंधन की जाँच की, ताकि यात्रा में कोई बाधा न आए। बुजुर्गों को सहज महसूस हो, इसके लिए उसने गाड़ी में कुशन, पानी की बोतल और छाता रख दिया।
घाट की ओर रवाना होते समय मनसुख ने गाड़ी में बैठे बुजुर्गों को मुस्कुराते हुए कहा, “आज हम सब मिलकर सूर्य देव को प्रणाम करेंगे, आपका आशीर्वाद हमारे साथ है।” गाड़ी धीरे‑धीरे गाँव की पगडंडियों से गुजरती, रास्ते में खेतों की हरियाली और धान के सुनहरे बाल देख कर मनसुख का मन शांति से भर गया। घाट पर पहुँचते ही, वह बुजुर्गों को सावधानी से उतार कर, उनके पैर धुलाने के लिए पानी की बाल्टी ले आया।
छठ पूजा के दो मुख्य चरण—नहाय-खाय और खरना—बड़े धूमधाम से संपन्न हुए। मनसुख ने दादी‑माँ के साथ मिलकर सूप, ठेकुआ और फल अर्पित किए। सूर्यास्त के समय, सभी ने घाट पर खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया। बुजुर्गों की धूप में चमकती आँखों में संतोष और आशीर्वाद स्पष्ट दिख रहा था।
पूजा के बाद, मनसुख ने बुजुर्गों को गाड़ी में बैठाया और घर की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में उसने सोचा कि इस पर्व ने उसे न केवल अपने ससुराल की संस्कृति से जोड़ा, बल्कि परिवार के प्रति उसकी जिम्मेदारी को भी गहराई से समझाया। छठ की शुद्धता, प्रेम और समर्पण को गाड़ी की छोटी यात्रा में भी महसूस किया जा सकता था—जहाँ हर मोड़ पर बुजुर्गों की हँसी और सूर्य देव की रोशनी मिलकर जीवन के नए अर्थ गढ़ रही थी।
घाट की ओर बढ़ते कदमों के साथ,
सुरों की लहरें हवाओं में घुलने लगीं—
बाँसुरी की मीठी तान, गीतों की सरसराहट,
मन में उठता प्रीत का उजाला, जैसे सूरज की पहली किरण।
कुंडली हुई धूप, पवित्र जल की बूंदें,
हर स्वर में छठी माई की आशीष सुनाई देती,
आपके कदमों में उत्साह, दिल में बंधी प्रीत—
क्या इस संगीत को शब्दों में बुनूँ, या आगे की कहानी सुनाऊँ?
*छठ मैया का प्रचलित गीत*
हे छठी माई, धूप में नहाओ री,
सूरज देव को अर्घ्य दे, पावन करो री।
काँची के बाँस की टोकरी में,
फल‑फूल, ठेकुआ, गन्ने की राली।
हाथ में धूप का दीप, गले में पायल,
सूरज को प्रणाम, मांगें सबका कल्याण।
हवा में गूँजे, “छठी माई की जय”,
बच्चे‑बुजुर्ग सब मिलकर गाएँ।
नहाय‑खाय, खरना‑अर्घ्य,
भक्ति‑भाव से भर दे हर घर‑ आँखी।
सूरज उगते ही, लाँए सवेरा,
छठी माई की कृपा से, सुख‑समृद्धि का फेरा।
_यह गीत बिहार‑उत्तरी प्रदेश में छठ पूजा के समय अक्सर गाया जाता है।_
घाट के किनारे पहुँचते‑ही हवा में गूँगते “छठी माई की जय” के स्वर और भी तेज़ हो गए। मनसुख ने गाड़ी को धीरे‑धीरे रेत के ढलान पर रोक दिया, जहाँ बुजुर्गों की टोली पहले से ही बैठी थी—दादी के हाथ में ठेकुआ की थाली, दादा के कंधे पर गन्ने की बाली, और सबके चेहरे पर उत्सव की चमक।
गाड़ी से उतरते ही मनसुख ने दादी को सहारा दिया, जबकि दादा ने अपनी पुरानी लाँगड़ी छड़ी को धूप में चमकते हुए टेक दिया। “बेटा, आज का दिन हमारे लिए खास है,” दादी ने मुस्कुराते हुए कहा, “छठी माई की कृपा से ही तो हम यहाँ तक पहुँचे हैं।”
घाट पर सजे हुए बांस के थालों में फल‑फूल, गुड़, दाल और चावल की राली रखी थी। महिलाएँ गीत गा रही थीं—“हे छठी माई, धूप में नहाओ री”—और उनका स्वर पानी की लँधियों में परावर्तित होकर एक मधुर प्रतिध्वनि बन गया। मनसुख ने भी हाथ जोड़ कर गीत में आवाज़ मिलाई, और उसका दिल एक अनजानी प्रीति से भर गया।
उसी क्षण, घाट के पास एक छोटा बच्चा रोते‑रोते गिर गया। उसकी माँ घबराई, पर दादा ने तुरंत उसे उठाया और धीरज से कहा, “डर मत, माई की नजर में हम सब सुरक्षित हैं।” बच्चा शांत होते‑ही माँ ने दादा को धन्यवाद दिया, और सबके चेहरे पर एक नई चमक आ गई।
रात होते‑ही, सूर्यास्त की सुनहरी किरणें पानी में डूबने लगीं। मनसुख ने बुजुर्गों को गाड़ी में बैठाया, पर इस बार वह खुद भी पीछे की सीट पर बैठा, ताकि वह भी छठी माई की अर्चना का हिस्सा बन सके। गाड़ी धीरे‑धीरे गाँव की सड़कों पर चल पड़ी, और पीछे छूटते हुए घाट की रोशनी में एक रहस्यमयी चमक देखी गई—जैसे कोई अनकटा हुआ धागा, जो इस पवित्र यात्रा को आगे की कहानी से जोड़ रहा हो।
मनसुख ने सोचा, “आज की यह यात्रा सिर्फ घाट तक नहीं, बल्कि जीवन के कई अनजाने मोड़ों तक ले जाएगी।” और गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए, वह उस रहस्यमयी रोशनी को देखता रहा, जो धीरे‑धीरे अंधेरे में विलीन हो रही थी।
- सुख मंगल सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक, वाराणसी वासी, अवध निवासी
Sukhmangal Singh
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