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ब्रज की धरा पर बंसी की धुन

 


ब्रज की धरा पर  बंसी की धुन

ब्रज की धरा पर आज भी बंसी की धुन बजती है,
हर कण-कण में राधा-कृष्ण की महक सजती है।

यमुना किनारे कदंब तले, अब भी साँझ सजती है,
गोपियों की पायल की छन-छन, हवाओं में बजती है।

मथुरा की गलियों में कान्हा का बचपन खेलता है,
वृंदावन के कुंजों में प्रेम का दीप जलता है।

बरसाने की होली में रंग नहीं, प्रेम बरसता है,
नंदगाँव के हर घर में आज भी कान्हा बसता है।

गिरिराज की परिक्रमा में श्रद्धा का रेला चलता है,
गोवर्धन की छाया में हर मन निर्मल बनता है।

कंक्रीट के जंगल से जब मन थक कर आता है,
ब्रज की रज माथे लगे, तो जीवन मुस्काता है।

'मंगल' कहे ब्रज धरती नहीं, मोक्ष की राह है,
जहाँ राधे-राधे बोलो, वहीं कृष्ण की चाह है।। 

- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी ,अम्बेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश 
Sukhmangal Singh

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