"बिखरे रिश्ते, सिमटे लोग"
बिखरे रिश्ते, सिमटे लोग, ये कैसा दौर आया है,
पास होकर भी हर इंसान, कितना दूर गया है।
घर तो बड़े हो गए, पर आंगन छोटा हो गया,
भाई-भाई में अब बस, दीवार का सौदा हो गया।
पहले त्योहार पर टोली आती थी मिलने,
अब व्हाट्सएप पर स्टिकर से काम चलता है गिनने।
माँ-बाप फोन पर बाट जोहते हैं,
बच्चे शहर में व्यस्तता को रोते हैं।
दादी की कहानियां अब यूट्यूब में बिक गईं,
दादा की सीखें अब किताबों में सिकुड़ गईं।
रिश्ते हैं पर उनमें वो मिठास नहीं,बिखरे रिश्ते, सिमटे लोग"
भीड़ तो है पर कोई पास नहीं।
आओ फिर से उन रिश्तों को सींच दें,
बिखरे मनकों को प्रेम से फिर पिरो दें।।
- डॉ. सुखमंगल सिंह/ वाराणसी
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