"बाल साहित्य : जादुई बस्ता"
टिंकू का बस्ता सबसे भारी था।
रोज़ सुबह माँ कहती - "टिंकू, टिफिन तो ले ले।"
टिंकू कहता:-"जगह नहीं है माँ, किताबें ही किताबें हैं।"
एक दिन स्कूल जाते हुए, टिंकू फिसल कर गिर पड़ा। बस्ते से किताबें बिखर गईं। एक बूढ़े बाबा ने उठाने में मदद की।
बाबा बोले:- "इतना भारी बस्ता? इसमें क्या है?"
टिंकू रोने लगा - "गणित, हिंदी, अंग्रेजी... पीठ दुखती है।"
बाबा ने हँस कर उसके बस्ते पर हाथ फेरा और कहा - "अब देखो।"
अगले दिन चमत्कार हुआ। टिंकू ने बस्ता उठाया - बिल्कुल हल्का!
स्कूल में उसने बस्ता खोला। अंदर से आवाज आई - "आज गणित का दिन है, सिर्फ गणित निकालो।"
टिंकू ने सिर्फ गणित की किताब निकाली। बाकी किताबें तो बस्ते में थीं ही नहीं!
छुट्टी में आवाज आई - "अब गणित अंदर रखो।"
टिंकू समझ गया। ये जादुई बस्ता था - जो काम हो, वही किताब बाहर आती थी।
एक हफ्ते बाद टिंकू सबसे तेज दौड़ने लगा, क्योंकि बस्ता हल्का था। टीचर ने पूछा - "टिंकू, अब होमवर्क रोज लाते हो?"
टिंकू बोला - "हाँ मैम, मेरा बस्ता अब मुझे याद दिलाता है।"
बाबा फिर कभी नहीं मिले, पर टिंकू ने सीखा - बस्ता किताबों से नहीं, समझदारी से हल्का होता है।
"सीख : जरूरत की चीज ही साथ रखो, जिंदगी आसान हो जाएगी।"
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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