Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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बहुरिया चीनी हो गइल

 
शादी में सादगी से बहुरिया रहले छैल छबीली,
सर्व सामाजिक गुण गौरव सम्पन्न रहती थी अलबेली।
शहर गइल जबसे वह दिखना कितना बदल गई है,
देख उन्हें सब धीरे-धीरे कहने लगें बहुरिया चीनी हो गइल।

वह थी सादगी की मूर्ति, अब है दिखावा की रानी,
वह थी प्रेम की पुतली, अब है स्वार्थ की कहानी।
वह थी समाज की बेटी, अब है अपने घर की रानी,
वह थी गौरव की प्रतीक, अब है लाश की कहानी।

वह थी जो सादगी में रहती थी, अब है दिखावे में मगन,
वह थी जो प्रेम में रहती थी, अब है स्वार्थ में अघन।
वह थी जो समाज के लिए जीती थी, अब है अपने लिए जीती,
वह थी जो गौरव की प्रतीक थी, अब है लाश की कहानी।।

वह थी जो सादगी में रहती थी, अब है दिखावे में मगन,
वह थी जो प्रेम में रहती थी, अब है स्वार्थ में अघन।
वह थी जो समाज के लिए जीती थी, अब है अपने लिए जीती,
वह थी जो गौरव की प्रतीक थी, अब है लाश की कहानी।

वह थी जो अलबेली थी, अब है चीनी हो गइल,
वह थी जो छैल छबीली थी, अब है दिखावा की रानी।
वह थी जो सर्व सामाजिक गुण गौरव सम्पन्न थी, अब है स्वार्थ की कहानी,
वह थी जो सादगी की मूर्ति थी, अब है दिखावे की पुतली।।

वह थी जो सादगी में रहती थी, अब है दिखावे में मगन,
वह थी जो प्रेम में रहती थी, अब है स्वार्थ में अघन।
वह थी जो समाज के लिए जीती थी, अब है अपने लिए जीती,
वह थी जो गौरव की प्रतीक थी, अब है लाश की कहानी।

वह थी जो अलबेली थी, अब है चीनी हो गइल,
वह थी जो छैल छबीली थी, अब है दिखावा की रानी।
वह थी जो सर्व सामाजिक गुण गौरव सम्पन्न थी, अब है स्वार्थ की कहानी,
वह थी जो सादगी की मूर्ति थी, अब है दिखावे की पुतली।
वह थी जो प्रेम की पुतली थी, अब है स्वार्थ की कहानी,
वह थी जो समाज की बेटी थी, अब है अपने घर की रानी।।

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक 
वाराणसी वासी ,अवध निवासी अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश 
Sukhmangal Singh



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