कुछ शब्द हैं जो पन्नों पर कभी उतरे ही नहीं,
साँसों में घुले रहे, आँखों में ठहरे रहे।
उनका कोई शीर्षक नहीं, कोई लेखक का नाम नहीं,
बस धड़कन की स्याही से लिखी एक अप्रकाशित किताब।
वे कविताएँ हैं जो रात के तीसरे पहर जागती हैं,
छत पर रखे अधूरे चाँद से बातें करती हैं।
सुबह होते ही ओस बनकर सूख जाती हैं,
किसी संपादक की मेज़ तक पहुँच नहीं पातीं।
अप्रकाशित होना भी एक तरह का प्रकाश है,
जो सिर्फ कहने वाले और महसूस करने वाले के बीच ठहरता है।
हर छपी हुई इबारत के पीछे,
एक अप्रकाशित सच साँस लेता है।
क्या ज़रूरी है कि हर दर्द छपे, हर ख़ुशी बाँटी जाए?
कुछ रौशनी - दीयों में ही खूबसूरत लगती है,
किताबों के कवर पर नहीं!
तुम्हारे भीतर भी होगी कोई ऐसी कविता,
जो आज तक अप्रकाशित है
पर सबसे ज़्यादा पढ़ी गई है।।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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