" अपनी लगाई आग में जल रहा हूं मैं"
अपनी लगाई आग में जल रहा हूं मैं।
देखना ना इधर क्या कर रहा हूं मैं।
खुद के हाथों बिछाए कांटों पर चल रहा हूं मैं।
लोग पूछते हैं मंजिल, मैं रास्ता बदल रहा हूं मैं।
सीने में तूफां लिए समंदर सा ठहरा हूं।
होंठों पर सन्नाटा लिए लफ्जों से लड़ रहा हूं मैं।।
जिसने आग लगाई थी, वही धुआं बेच रहा है।
और मैं राख समेट कर चिराग भर रहा हूं मैं।।
सपनों की दीवारें खुद गिरा कर बैठा हूं।
मलबे के नीचे से उम्मीद निकाल रहा हूं मैं।
तेरे नाम का कफन ओढ़ कर जी रहा हूं।
हर सांस के साथ मौत को टाल रहा हूं मैं।
दोस्ती के नाम पर दुश्मनी निभा रहा है जमाना।
और मैं दुश्मनों से भी रिश्ता निभा रहा हूं मैं।
आइना देखता हूं तो चेहरा अजनबी लगता है।
अपनी ही परछाई से नजर बचा रहा हूं मैं।
रात भर जाग कर तारों से बातें करता हूं।
दिन में सूरज को भी काला बता रहा हूं मैं।।
जिसे दिया था दिल, वही सौदा कर गया।
टूटे टुकड़े समेट कर खुदा से मांग रहा हूं मैं।
माना कि गुनाहगार हूं अपनी ही नज़रों में।
पर सजा भुगतते हुए फिर गुनाह कर रहा हूं मैं।
कोई पूछे तो कहना, जल कर राख हो गया।
पर राख में भी कोई चिंगारी रख रहा हूं ।।
- सुख मंगल सिंह
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