" अंधेरी रात की आवाज़"
रात जाग रही थी। गाँव के बाहर वाली कच्ची सड़क पर टॉर्च की पीली रोशनी हिल रही थी। 4-5 लोग जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा रहे थे। हाथ में कुछ कागज़, कुछ फॉर्म।
"सुनो चाचा, सरकार की योजना आई है। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए धन दे रहे हैं" - उनमें से एक बोला।
पीछे चल रहे बुजुर्ग रामलाल चाचा रुक गए। "किस मद में लगाना है ये पैसा?"
"यही तो बता रहे हैं। सरकार की योजना का लाभ उठाना। चाहे राज्य की हो या केंद्र की, फॉर्म भर दो। भूल मत जाना। इस मद में लगाना - घर की मरम्मत, बच्चों की पढ़ाई। हिसाब देना पड़ेगा।"
रामलाल चाचा ने कागज़ पलटे। लिखा था - 'आवेदन की अंतिम तारीख कल'। गाँव में बिजली नहीं थी, मोबाइल में नेटवर्क नहीं। पंचायत भवन भी 3 कोस दूर।
वो रात भर सो नहीं पाए। सुबह होते ही साइकिल उठाई और ब्लॉक ऑफिस पहुँचे। वहाँ पता चला - योजना तो सच में आई थी। पर वो किसी एक धर्म के लिए नहीं थी। राज्य और केंद्र दोनों की अलग-अलग स्कीम थीं। एक गरीबों के मकान के लिए, दूसरी बच्चों की स्कॉलरशिप के लिए।
"भूल ये मत करना चाचा" बाबू ने कहा, "कागज़ पढ़े बिना दस्तखत मत करना। सरकारी योजना का लाभ सबको है। बस सही मद में लगाओ और समय पर फॉर्म जमा करो।"
रामलाल चाचा लौटते समय सोच रहे थे - रात में जो लोग आए थे, उनका इरादा शायद गलत नहीं था। पर अधूरी जानकारी आधी रात में डर भी बन जाती है, और मौका भी।
अगली रात जब फिर टॉर्च की रोशनी दिखी, तो चाचा खुद सड़क पर निकल गए। बोले - "रुको भाई। योजना की पूरी जानकारी दो। किस मद का पैसा है, कौन सी सरकार की है, कागज़ दिखाओ। हम लाभ लेंगे, पर समझकर।"
उस रात गाँव जागा नहीं, समझा।
सीख:
सरकारी योजना हो या कोई भी मदद - रात के अंधेरे में सुनी बात पर नहीं, दिन की रोशनी में कागज़ पर भरोसा करो। राज्य की हो या केंद्र की, जानकारी पूरी रखो। लाभ तभी है जब भूल न हो।
कहानी आगे बढ़ती है:
"कहानी: अंधेरी रात की आवाज़ - भाग 2"
ब्लॉक ऑफिस से लौटकर रामलाल चाचा ने पंचायत में ढोल बजवाया। सुबह-सुबह सब इकट्ठा हुए।
चाचा बोले: "भाइयों, रात वाले लोग झूठ नहीं बोल रहे थे। योजना सच में आई है। पर दो तरह की है। एक बच्चों की पढ़ाई की स्कॉलरशिप। दूसरी - घर और शौचालय बनाने की।"
गाँव की स्कूल टीचर बिटिया ने कहा: "चाचा, हमारे स्कूल के 12 बच्चे 5वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। फीस और किताब का खर्च नहीं उठा पाते। स्कॉलरशिप से उनकी पढ़ाई बच जाएगी।"
तभी सुमित्रा काकी आगे आईं। उनके आँगन में शौचालय नहीं था। बरसात में दिक्कत होती थी। चाचा ने फॉर्म दिखाया: "देखो काकी, यहाँ लिखा है - 'स्वच्छता योजना'। पक्का शौचालय बनेगा, सरकारी मदद से। सही मद में पैसा लगेगा तो बच्चे बीमार भी कम पड़ेंगे।"
पंच के लड़के मोहन का कच्चा मकान था। छत टपकती थी। बाबू ने बताया: "ये 'आवास योजना' है। गरीब परिवार को पक्का मकान मिलता है। ईंट, सीमेंट, मज़दूरी - सबका हिसाब होगा। भूल ये मत करना कि पैसा किसी और काम में लगा दो।"
अगले हफ्ते गाँव में मिस्त्री आए। पहले सुमित्रा काकी के आँगन में शौचालय बना। फिर मोहन के लिए मकान की नींव रखी। स्कूल में 12 बच्चों के फॉर्म भरे गए।
6 महीने बाद स्कूल की बिटिया मंच पर बोली: "अब रात में टॉर्च लेकर कोई आए तो हम डरेंगे नहीं। पूछेंगे - कौन सी योजना है? बच्चों के लिए क्या है? शौचालय और मकान का क्या हिसाब है?"
रामलाल चाचा हँसे: "बस यही चाहिए। योजना का लाभ तभी है जब हम जागकर, समझकर लें। राज्य की हो या केंद्र की, बच्चों का फायदा होना चाहिए।"
नई सीख:
सरकारी मदद का असली मतलब तब है जब बच्चों को पढ़ाई मिले, माँ को शौचालय मिले, और परिवार को पक्का छत मिले। जानकारी पूरी रखो, फॉर्म सही भरो, और पैसा सही मद में लगाओ।।
डॉ .सुखमंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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