अलग हुआ कुछ भेद न पाया
एक छोटे से गाँव में, एक बूढ़ा संत रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी, और लोग उनकी सलाह लेने के लिए आते थे। एक दिन, दो युवक उनके पास आए और बोले, "संत जी, हमें एक समस्या है। हम दोनों एक ही गाँव के हैं, लेकिन हमारे बीच में एक बड़ा भेद है। हम एक ही धर्म के हैं, लेकिन हमारे विचार अलग-अलग हैं। हम कैसे एक हो सकते हैं?"
संत जी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराए। उन्होंने कहा, "चलो, मेरे साथ।" वे उन्हें एक खेत में ले गए, जहाँ एक बड़ा सा पेड़ था। उन्होंने कहा, "इस पेड़ को देखो। यह पेड़ कितना बड़ा और सुंदर है! लेकिन अगर मैं इसके एक पत्ते को तोड़कर तुम्हें दूं, तो क्या तुम इसे पहचान पाओगे कि यह किस पेड़ का पत्ता है?"
दोनों युवकों ने पत्ते को देखा और कहा, "हाँ, यह तो उसी पेड़ का पत्ता है।"
संत जी ने कहा, "अब, इस पत्ते को इस पेड़ से अलग कर दो।" उन्होंने पत्ते को पेड़ से अलग कर दिया।
दोनों युवकों ने देखा कि पत्ता अब पेड़ से अलग हो गया था, लेकिन वह अभी भी हरा-भरा था। संत जी ने कहा, "अब, इस पत्ते को इस पेड़ के पास रखो और देखो क्या होता है।"
दोनों युवकों ने पत्ते को पेड़ के पास रखा और देखा कि पत्ता अब पेड़ से जुड़ गया था। संत जी ने कहा, "यह देखो, पत्ता अब पेड़ का हिस्सा बन गया है। यह पत्ता अब अलग नहीं है, यह पेड़ का ही एक हिस्सा है।"
दोनों युवकों ने समझा कि संत जी क्या कहना चाहते हैं। उन्होंने कहा, "संत जी, आप कहना चाहते हैं कि हम भी एक ही पेड़ के पत्ते हैं। हम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हम एक ही पेड़ के हिस्से हैं।"
संत जी ने कहा, "हाँ, यही बात है। हम सभी एक ही मानवता के हिस्से हैं। हमारे विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हम एक ही मानवता के हिस्से हैं। हमें अपने भेदों को भूलकर एक होना चाहिए।"
दोनों युवकों ने संत जी की बात समझी और एक दूसरे के साथ गले मिले। उन्होंने अपने भेदों को भुलाकर एक होने का फैसला किया।
*निष्कर्ष*
इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि हम सभी एक ही मानवता के हिस्से हैं। हमारे विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमें अपने भेदों को भूलकर एक होना चाहिए। हमें प्रेम और एकता के साथ रहना चाहिए, और अपने देश और समाज के लिए काम करना चाहिए।
- कवि सुख मंगल सिंह
वाराणसी
Sukhmangal Singh
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