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अखिल भारतीय कवि सम्मेलन "संस्मरण''

 
अखिल भारतीय कवि सम्मेलन "संस्मरण / समाचार रिपोर्ट" 
"शब्दों की रात" - सरोज-विद्याशंकर महाविद्यालय, बदलापुर" जौनपुर  
संस्मरण - 20 मई 2018, रविवार

बालवरगंज, बदलापुर, जौनपुर। 
20 मई 2018 की रात साहित्य के नाम रही। " सरोज-विद्याशंकर महाविद्यालय" के प्रांगण में " अखिल भारतीय कवि सम्मेलन" का आयोजन हुआ। समय था रात्री 9:30 बजे से 1:15 बजे तक।

कार्यक्रम का उद्घाटन क्षेत्रीय विधायक जी के कर-कमलों से हुआ। सबसे पहले " सरस्वती जी के प्रतीक चिन्ह" पर फूलमाला अर्पित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।

स्वागत भाषण और धन्यवाद ज्ञापन:-
महाविद्यालय के संस्थापक *पंडित विद्याशंकर तिवारी* जी ने किया। उन्होंने सभी आगंतुकों का अभिनंदन किया।  
पूरे कार्यक्रम का "संचालन और दिशा निर्देशन" साहित्यिक पत्रिका -संयोग साहित्य त्रैमासिक हिंदी डायजेस्ट- के संस्थापक "श्री मुरलीधर पांडेय"  जी ने कुशलता से किया।

मंच पर देश के नामचीन साहित्यकार उपस्थित थे। नवगीत के वरिष्ठ रचनाकार सर्वश्री सुरेन्द्र वाजपेयी, अमरनाथ शुक्ल, रमेश प्रसून, मनोज फगवाणी, देवी प्रसाद पांडेय, केशव शरण, राम कुमार, नारद जी और गूगल सहित विविध साइटों पर लेखन से जुड़े " सुखमंगल सिंह" जी ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।  
मनिकापुर, गोंडा से पधारे खालिद हुसैन सिद्दीकी जी को विशेष रूप से फूलमाला, शाल और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

सभी रचनाकारों को फूलमाला और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। श्रोताओं में विद्यार्थी, विद्वान, कर्मचारी और क्षेत्र के गणमान्य नागरिक देर रात 1:30 बजे तक बैठे रचनाओं का आनंद लेते रहे। बीच-बीच में तालियों की गूंज से पूरा पंडाल गूंज उठा।

"सुखमंगल सिंह" जी ने अपनी चर्चित रचना प्रस्तुत की:

आम की डाली है,  
कहने तो दो!  
पीपल के पेड़ को  
सांस लेने को दो!

जिस ने बना रखा  
झोपड़ी और महल,  
दिल है अपना ही  
पढ़ने तो दो!

वह बोले तो अमृत  
हम बोले तो जहर!  
उसे अपना वह गम  
कहने तो दो!

कितनी प्यास लिए  
खूंटों के बांधे हम!  
बन घना अंधेरा  
बात कहने तो दो!

कच्चा मका हूं मैं  
गिरने न दो!  
आम की डाली  
कहने तो दो!!

समापन पर लगा कि बदलापुर की इस धरती पर उस रात साहित्य ने सच में राज किया।

- सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत।

ये वो रात थी जब शब्दों ने अंधेरे को भी उजाला कर दिया था। 







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