ऐसा भी होता है जीवन में संस्मरण
*संस्मरण: "ऐसा भी होता है जीवन म" – सुखमंगल सिंह के जीवन से*
बनारस की गलियों में शाम ढले जब शंख की ध्वनि गंगा की लहरों से टकराती है, तब कहीं न कहीं सुखमंगल सिंह की कोई पंक्ति हवा में तैर जाती है। 26 जून 1956 को फैजाबाद के अहिरौली रानीमऊ गाँव में जन्मे सुखमंगल का बचपन धान के खेतों और आम के बगीचों में बीता। पिता राम समुझ सिंह किसान थे, माँ मेवाती देवी घर संभालतीं। घर में अभाव था पर किताबों का आदर था।
ऐसा भी होता है कि मिट्टी की सोंधी खुशबू ही किसी को कवि बना दे। सुखमंगल ने गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते हुए ही तुकबंदी शुरू कर दी। दीवारों पर कोयले से लिखते, "बाबा, बैल कहाँ बाँधूँ, खेत तो कहीं बिकने जाए ।" मास्टर जी डाँटते, पर मन ही मन जानते कि लड़का कुछ अलग है।
गाँव से भागलपुर तक का सफर आसान नहीं था। विक्रमशिला विद्यापीठ से वाचस्पति की मानद उपाधि ली, साहित्य सागर बने। पर डिग्री के साथ जिम्मेदारी भी आई। तीन भाइयों में बीच का होने का दर्द वही जाने जो साँझ को चूल्हा खाली देखे। काशी कर्मभूमि बनी। किराए के एक कमरे में रहते, दिन में ट्यूशन पढ़ाते, रात में लालटेन की रोशनी में कविता लिखते। आगे चलकर सुख मंगल सिंह को पार्ट टाइम नौकरी मिली। वहां भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा।
ऐसा भी होता है कि कवि का पहला संग्रह छपे और घर में रोटी कम पड़ जाए। _सरयू तट से_ और _सुपाठय काव्य सरिता_ जब छपे तो आलोचकों ने सराहा, पर रॉयल्टी के नाम पर कुछ सौ रुपए मिले। सुखमंगल हँसते, "कविता पेट नहीं भरती, पर आत्मा तो भरती है न।"
उनका लेखन बनारस बोलता है। पान की दुकान, अस्सी घाट की सीढ़ियाँ, सुबह का हर-हर महादेव, सब उनकी कविता में उतर आया। _मैं नारी हूं_ जैसी आलोचना पुस्तक लिखी तो स्त्री-विमर्श को नई भाषा दी। पर घमंड छू तक नहीं गया। आज भी कोई नया लड़का अपनी कविता लेकर पहुँचे तो पूरी रात जगकर सुधारते हैं।
एक बार कवि सम्मेलन में मंच से उतरते वक्त फिसल गए। माइक संभालते हुए बोले, "गिरना तो तय था, काशी में अहंकार टिकता कहाँ है।" पूरा पंडाल ठहाकों से गूँज उठा। ऐसा ही सहज व्यक्तित्व है उनका।
ऐसा भी होता है कि सम्मान खूब मिले पर कवि फिर भी साइकिल से ही चले। गूगल, व्हाट्सएप पर दर्जनों सम्मान पत्र हैं, पर असली सम्मान वो मानते हैं जब कोई रिक्शावाला कहे, "भइया, आपकी _गगन में लहराए तिरंगा_ सुनकर रोंगटे खड़े हो गए।"
आज भी अवध की बोली नहीं भूले। कहते हैं, "अवधपुरी का वासी हूँ, काशी में निवासी हूँ। चलना काम अपना, परोपकारी प्रवासी हूँ।" भाईचारा और सद्भावना उनकी सद्भावना यात्रा का मूल मंत्र रहा। वो मानते हैं कि शांति की एक बूंद भी समाज का मरुस्थल सींच सकती है।
68 साल की उम्र में भी कलम नहीं रुकी। पूछो तो कहते हैं, "जब तक गंगा बहेगी, तब तक शब्द भी बहेंगे।" सुखमंगल सिंह का जीवन बताता है कि साहित्य एयरकंडीशन कमरों में नहीं, धूल भरी पगडंडियों पर जन्म लेता है।
ऐसा भी होता है कि एक किसान का बेटा अपनी कविता से पूरे शहर की आत्मा बन जाए। बनारस का ये वरिष्ठ साहित्यकार आज भी हर नए रचनाकार के लिए अभिराम छाँव है।
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