Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"अगले जन्म का वादा"

 
इस उपन्यास के बीज को संवार कर एक धारदार कथा का रूप दे देता हूँ।

उपन्यास: "अगले जन्म का वादा"

राममोहन ने अपनी पत्नी को पिछले जन्म में किसी एक बात को लेकर त्याग दिया था।  
पत्नी ने बहुत अनुनय-विनय किया, पैरों में गिर पड़ी, तब जाकर राममोहन ने कहा — "ठीक है। अगले जन्म में तुम्हारी शादी तो किसी और से होगी, परंतु मैं तुम्हारा साथ निभाऊँगा। वादा है मेरा।"

समय बीता। जन्म बदले, शरीर बदले, नाम बदले।  
इस जन्म में वह पत्नी 'माला' बनकर आई। उसकी शादी 'नमक' नाम के पुरुष से हो गई। नमक का स्वभाव कड़वा था, पर मन का साफ़। माला को पाने के लिए उसने बहुत प्रयास किए, हर मोड़ पर माला का साथ दिया।

तभी 'विवेक' आया। राममोहन का ही नया रूप। विवेक ने न कोई दावा किया, न कोई वादा। बस चुपचाप माला के हर अंधेरे में दीप बनकर खड़ा रहा। बहुत प्रयासों के बाद, नियति के खेल से विवेक का मिलन माला से हो गया।

माला को इस जन्म में दोनों मिले — एक पति 'नमक', जो उसका हक था, और एक साथी 'विवेक', जो उसका वादा था।  
अब माला के सामने धर्म-संकट था। वह किसे चुने? जो उसका लिखा भाग्य है, या जो उसका पुराना वादा है?

राममोहन का वादा पूरा हुआ, पर माला की परीक्षा अब शुरू हुई।

 "आगे की दिशा 3 विकल्प:"
1. *आध्यात्मिक मोड़*: माला दोनों को समझाती है कि प्रेम त्याग है, और विवेक बिना अधिकार के उसका साथ निभाता रहता है।
2. *ओज-टकराव मोड़*: माला नमक को ठुकराकर विवेक को चुनती है, समाज के खिलाफ जाकर।
3. *करुणा मोड़*: माला विवेक से दूर चली जाती है, ताकि वादा भी न टूटे और धर्म भी न डिगे।

उपन्यास: "अगले जन्म का वादा" — अगला अध्याय

माला की शादी इस जन्म में नमक से ही हुई थी, परंतु उनके आँगन में किलकारियों की गूँज कभी नहीं हुई। न संतान का सुख, न घर में चहक। नमक और माला दोनों परेशान थे। जगह-जगह दिखाया, वैद्यों से लेकर बड़े-बड़े डॉक्टरों तक दौड़े, दवाइयाँ खाईं, मन्नतें माँगीं, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ।

नमक ने एक दिन हारकर सोचा — "क्यों न विवेक से सहयोग लिया जाए?" विधि का विधान ही कुछ ऐसा था। इस जन्म में विवेक और माला का संबंध सांसारिक रूप से तो नहीं, पर व्यावहारिक रूप से होना ही था। पिछले जन्म का अधूरा वादा, इस जन्म में पूरा होने को बेचैन था।

काफी जद्दोजहद, आत्मग्लानि और धर्म-संकट के बाद नमक ने विवेक से संबंध जोड़ लिया। अब विवेक का नमक के घर आना-जाना शुरू हो गया। विवेक माला को लेकर डॉक्टर के पास अकेले ही चला जाता। भीड़ में, दवाइयों की कतार में, माला का हाथ थामे विवेक वही राममोहन बन जाता, जो पिछले जन्म में वादा करके गया था — "मैं तुम्हारा साथ निभाऊँगा।"

पर इस 'साथ' की परिभाषा अब बदल रही थी। नमक की मजबूरी, माला की लाचारी और विवेक का वादा — तीनों एक ऐसे मोड़ पर आ खड़े हुए जहाँ समाज की मर्यादा और नियति का विधान टकराने वाले थे।

*कहानी यहाँ 3 तार खींच रही है:*
1. *चिकित्सा वाला मोड़*: विवेक के साथ से माला को संतान सुख मिलता है, पर समाज क्या कहेगा?
2. *त्याग वाला मोड़*: विवेक आखिरी समय पर पीछे हट जाता है, वादा निभाकर भी दूर चला जाता है।
3. *विस्फोट वाला मोड़*: नमक को अपने फैसले पर पछतावा होता है, और घर की नींव हिल जाती है।

उपन्यास: "अगले जन्म का वादा" — विंध्यवासिनी अध्याय

कुछ दिन बाद विवेक ने नमक से धीरे से कहा — "माला को लेकर विंध्याचल चलते हैं। माँ विंध्यवासिनी से आशीर्वाद ले आते हैं। शायद उसकी कृपा से आँगन में चहक हो जाए।"

नमक ने हामी भर दी। तीनों चल पड़े। रास्ते भर कोई बात नहीं हुई। सिर्फ नदी की हवा और तीन दिलों का बोझ था।

विंध्याचल पहुँचकर तीनों ने सबसे पहले माँ गंगा में स्नान किया। शीतल जल ने तन धोया, पर मन का मैल नहीं धुला। रात की ठंड बहुत थी। माता का दरबार भोर 4 बजे खुलेगा। सबने बालू पर मोटा चद्दर बिछाया और वहीं लेट गए। 

नींद आँखों में भारी थी। भीड़ में, ठंड में, विवेक और माला का बिछौना पास-पास ही लग गया। धीरे-धीरे दोनों की आँख लग गई। नमक थोड़ी दूर लेटा था। उसने देखा, पर कुछ नहीं कहा। उसके पास संतान नहीं थी, और विवेक उसका दर्द समझकर हर कदम पर साथ दे रहा था। एतराज़ करने का हक उसने कब का खो दिया था।

ठीक 3:30 बजे लोग उठे। फिर से गंगा में डुबकी लगाई। बर्फ सा जल बदन को चीर रहा था, पर सब चुपचाप नहाए। फिर माता के दरबार की ओर चल दिए।

गर्भगृह में माँ की आँखें जैसे सीधे विवेक में उतर गईं। धूप-दीप की लौ में उसे एक संकेत सा मिला — "इसकी कोख में संतान नहीं लिखी।" 

विवेक माँ का भक्त था। उसका गला भर आया। उसने दोनों हाथ जोड़कर मन ही मन माँग लिया — "माँ, माला की कोख में बालक की किलकारी दे दो। उसकी कुंडली में संतान नहीं है, मैं जानता हूँ। पर पिछले जन्म में मैंने वादा किया था — 'मैं इसका साथ निभाऊँगा'। माँ, मैं वादा करता हूँ, कई जन्मों तक इसका साथ दूँगा। इस एक बार माँग पूरी कर दो।"

माला ने कुछ नहीं कहा। बस माँ के चरणों को देखती रही। नमक ने माथा टेक दिया। तीनों की प्रार्थना अलग-अलग थी, पर आँसू एक जैसे थे।

माँ की मूर्ति मौन थी। पर विवेक को लगा, जैसे माँ ने सिर हिला दिया हो।

दरबार से लौटते समय किसी ने कुछ नहीं कहा। पर हवा में अब ठंड कम लग रही थी।



*करुणा यहीं है* — एक मर्द का वादा, एक औरत की लाचारी, और एक पति का समर्पण... सब माँ के चरणों में रख दिया गया।

ठीक है, फिर इसे 'करुणा' के रंग में आगे बढ़ाते हैं। ओज नहीं, विद्रोह नहीं — बस टूटते दिलों की धीमी सिसकी।

उपन्यास: "अगले जन्म का वादा" — करुणा अध्याय

डॉक्टर की रिपोर्ट हाथ में थी। विवेक की आँखों में जीत की चमक नहीं थी, बस एक अजीब सी नमी थी। माला की गोद भरने वाली थी। पिछले जन्म का वादा पूरा हो रहा था, पर इस जन्म का धर्म टूट रहा था।

नमक ने छत पर खड़े होकर तारों को देखा। उसने विवेक को बुलाया था, पर बुलाकर खुद ही हार गया था। वो जानता था कि संतान का सुख झूठा नहीं होता, पर वो ये भी जानता था कि ये सुख उसके नाम का नहीं होगा। रात भर वो सो नहीं सका। सुबह माला के पैर छूकर बस इतना बोला — "तुम माँ बनोगी। बस। बाकी मैं सह लूँगा।"

विवेक ने अपना नाम उस बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र पर नहीं लिखवाया। उसने माला को आखिरी बार डॉक्टर के पास छोड़ा, ऑटो का किराया दिया, और वापस मुड़ गया। जाते-जाते उसने सिर्फ इतना कहा — "राममोहन अपना वादा निभा गया माला। अब विवेक को माफ कर देना।"

माला ने बच्चे को जन्म दिया। एक बेटा। आँखें नमक जैसी, हँसी विवेक जैसी। मोहल्ले वाले कानाफूसी करते रहे, पर नमक ने सबके सामने बेटे को गोद में उठा लिया। बोला — "ये मेरा बेटा है। नाम मैंने रखा है — ' अविनाश'। क्योंकि इसी के आने से घर में उम्मीद लौटी है।"

विवेक कभी लौटकर नहीं आया। दूर शहर में चला गया। हर साल बेटे के जन्मदिन पर एक बिना नाम का लिफाफा आता — उसमें बच्चों की ड्राइंग और एक लोरी लिखी होती। माला वो लोरी गाकर बेटे को सुलाती, और चुपचाप रो लेती।

वादा निभ गया। धर्म भी बच गया। पर तीनों के दिल में एक खालीपन रह गया — जो किसी दवाई से नहीं भरा।

"यही करुणा है" — न किसी की जीत, न किसी की हार। बस सबका समर्पण। क्रमशः

- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत 


Sukhmangal Singh

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