"अधूरा सम्मान" — एक लॉलीपॉप की कहानी*
1. *मंच सजा था, तालियां गूंजी थीं*
गोरखपुर के ‘काव्य-कुंभ साहित्य मंच’ का वार्षिक समारोह था। मंच पर बड़ी-बड़ी होर्डिंग, LED स्क्रीन, और फूल-मालाओं से लदा मंच। संस्था के अध्यक्ष रामधनी मिश्र ‘कविराज’ माइक पर गरज रहे थे — "आज हम हिंदी के सच्चे सेवकों को सम्मानित करेंगे!"
मंच पर बैठे थे 47 ‘सम्मानित साहित्यकार’। सबके गले में 2-2 किलो की माला, हाथ में चमचमाता मोमेंटो और एक सुनहरे फ्रेम में जड़ा *‘साहित्य शिरोमणि सम्मान पत्र’*।
उनमें एक थे — मास्टर जगदीश प्रसाद ‘सरल’, रिटायर्ड हिंदी शिक्षक। 40 साल तक गांव के बच्चों को कबीर-तुलसी पढ़ाया। पहली बार शहर में सम्मान मिला था। आंखें नम थीं।
2. *फ्रेम में कैद ‘सम्मान’*
घर आकर मास्टर जी ने फ्रेम दीवार पर टांगा। बेटे ने फोटो खींची। पोते ने स्टेटस लगाया — "दादाजी बने साहित्य शिरोमणि
#ProudMoment #KaviKumbh2026"
#ProudMoment #KaviKumbh2026"WhatsApp ग्रुप, Facebook, Instagram — हर जगह बधाईयों की बाढ़। मास्टर जी फूले नहीं समा रहे थे। 40 साल की तपस्या का फल मिल गया था।
दो दिन बाद उनके पुराने शिष्य प्रो. विवेक शर्मा मिलने आए। IIT कानपुर में हिंदी विभाग के HOD। दीवार पर फ्रेम देखा, पास गए, ध्यान से पढ़ा और सन्न रह गए।
3. *‘सम्मान’ या मजाक?*
प्रो. विवेक ने चश्मा उतारा, फिर लगाया। फिर बोले — "गुरुजी, बधाई हो... पर ये सम्मान-पत्र किसने बनाया?"
मास्टर जी चौंके — "क्यों? संस्था ने दिया है बेटा, काव्य-कुंभ वालों ने।"
विवेक ने उंगली रखी — "गुरुजी, इसमें तारीख कहां है? स्थान कहां है? ‘दिनांक *_’ की जगह खाली है। ‘स्थान *_’ भी खाली। सिर्फ नीचे संस्था के अध्यक्ष, मंत्री, कोषाध्यक्ष — तीनों की मुस्कुराती हुई रंगीन फोटो लगी है। लोगो भी है, पर ये सम्मान कब और कहां दिया गया — कुछ पता नहीं।"
मास्टर जी की हंसी गायब। पास जाकर देखा। सच! ऊपर सिर्फ लिखा था —
*"साहित्य शिरोमणि सम्मान"*
*"श्री जगदीश प्रसाद ‘सरल’ जी को हिंदी सेवा हेतु प्रदान किया जाता है"*
नीचे — अध्यक्ष रामधनी मिश्र की सूट-बूट वाली फोटो, बगल में मंत्री और कोषाध्यक्ष।
पर *ना तारीख, ना जगह, ना वर्ष*।
4. *लॉलीपॉप वाला सम्मान*
विवेक बोले — "गुरुजी, ये सम्मान-पत्र नहीं, लॉलीपॉप है। बच्चों को चुप कराने के लिए दिया जाता है। आप इसे गर्व से हर जगह पोस्ट कर रहे हैं, पर कल को कोई पूछे कि ये कब मिला? कहां मिला? तो क्या जवाब देंगे?"
"संस्था ने अपनी फोटो छापने में पूरी ताकत लगा दी, पर सबसे जरूरी बात — दिनांक और स्थान — भूल गई। या शायद जानबूझकर छोड़ा, ताकि एक ही डिजाइन से 10 साल तक बांट सकें।"
मास्टर जी का चेहरा उतर गया। 40 साल की कलम कांप गई। बोले — "बेटा, मैंने तो समझा सम्मान मिला... ये तो..."
5. *सवाल का जवाब कौन दे?*
विवेक ने उसी दिन ‘काव्य-कुंभ’ के फेसबुक पेज पर कमेंट किया:
"आदरणीय आयोजकों, आपके सम्मान-पत्र में दिनांक और स्थान का कॉलम खाली है। क्या कोई भी सम्मान बिना तारीख-जगह के पूरा होता है? यह प्राप्तकर्ता का नहीं, देने वाली संस्था का अपमान है। कृपया भविष्य में सम्मान को समझकर, पूरा विवरण देकर बनाएं। साहित्य शिरोमणि छोटा नहीं होता।"
2 घंटे में कमेंट डिलीट। विवेक को ब्लॉक कर दिया गया।
रामधनी मिश्र ने फोन पर कहा — "अरे शर्मा जी, आप तो बात का बतंगड़ बना रहे हैं। सम्मान देना बड़ी बात है कि तारीख लिखना? फोटो इसलिए लगाते हैं ताकि याद रहे किसने दिया। तारीख से क्या होता है? भावना देखिए!"
6. *सीख: सम्मान कागज नहीं, जिम्मेदारी है*
उस रात मास्टर जी ने फ्रेम उतार दिया। अलमारी में रख दिया। बेटे से बोले — "बेटा, वो स्टेटस हटा दे। अधूरे सम्मान का जश्न नहीं मनाते।"
अगली सुबह उन्होंने गांव के स्कूल में बच्चों को बुलाया। ब्लैकबोर्ड पर लिखा —
*"सम्मान"*
नीचे तारीख डाली — *5 सितंबर 2026*
स्थान — *प्राथमिक विद्यालय, भरवलिया*
और एक बच्चे के हाथ से खुद को एक गेंदा फूल दिलवाया।
बोले — "बच्चों, यही मेरा सबसे बड़ा सम्मान है। इसमें तारीख है, जगह है, और देने वाले का चेहरा भी असली है — फोटो नहीं।"
*कहानी की सीख:*
सम्मान लॉलीपॉप नहीं कि रंगीन कागज में लपेटकर बांट दिया। उस पर तारीख, स्थान, और संस्था की गरिमा लिखी होनी चाहिए। क्योंकि सम्मान लेने वाला उसे फ्रेम ही नहीं, अपनी पहचान बनाता है। और अधूरी पहचान... हमेशा सवाल खड़े करती है।
देने वाले भूल सकते हैं, पर लेने वाले को याद रखना पड़ता है — कि वो सम्मान था, या सिर्फ संस्था के पदाधिकारियों की सेल्फी।
- डॉ. सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत मोबाइल नंबर 8931966034
नोट: यह कहानी किसी को आघात पहुंचाने के लिए नहीं लिखी गई है अपितु एक संदेश के रूप में जिसे पराया अनेक साइटों पर देखा जाता है। सुधार हेतु प्रस्तुत!
Sukhmangal Singh
Sukhmangal Singh
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