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राम- नाम -मनि दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
' तुलसी ' बहिरौ ,जो चाहसि उजियार।।
*भावार्थ (50 शब्दों में):*
तुलसीदास कहते हैं — यदि भीतर-बाहर उजाला चाहते हो, तो जीभ रूपी देहली पर राम-नाम रूपी मणिदीप रखो। जैसे दीपक देहरी पर रखने से घर-आँगन दोनों प्रकाशित होते हैं, वैसे ही जिह्वा से निरंतर राम-नाम जपने से मन और जीवन दोनों आलोकित हो जाते हैं।
*मेरी अभिव्यक्ति:*
तुलसी का ये दोहा मुझे दीया और दरवाज़े का सबसे सुंदर रिश्ता लगता है। जीभ देहरी है — न पूरी भीतर, न पूरी बाहर। और राम-नाम वो मणिदीप है जो एक जगह जलकर दो दुनिया रोशन कर देता है।
जब हम बोलते हैं, शब्द बाहर जाते हैं पर असर भीतर भी छोड़ते हैं। गाली दो तो खुद का मन भी मैला होता है, राम-नाम लो तो बोलने वाले का हृदय पहले नहाता है।
आज के शोर में ये दोहा याद दिलाता है — उजाला चाहिए तो स्विच बाहर नहीं, दीया जीभ पर रखना होगा। नाम-स्मरण कोई कर्मकांड नहीं, मन का दीपक है। जब जिह्वा पर राम बस जाए, तो आँखें अपने-आप करुणा देखती हैं, कान अपने-आप सत्य सुनते हैं।
भीतर का अँधेरा मिटे तो बाहर की दुनिया भी जगमग लगती है। बस देहरी सूनी न रहे, मणिदीप जलता रहे।।
- सुख मंगल सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक
वाराणसी
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